"हां, कुछ ऐसा ही दिखाई देता है," राजा ने बालक को गोद में उठाते हुए कहा। "कितना सुन्दर बालक है,” वह बोले। “इसके माता-पिता को इस पर कितना गर्व होगा।" 

तपस्विनी ने राजा को देखा और फिर बालक को और सोचने लगी, "हे ईश्वर ! सर्वदमन की शक्ल इस व्यक्ति से कितनी मिलती है। कितनी अजीब बात है और फिर सर्वदमन उनकी गोद में चला गया है और उनका कहना मानकर शेर के बच्चे को भी छोड़ दिया है।" 

"यह किसका बच्चा है ?" राजा ने तपस्विनी से पूछा।

"यह एक बहुत बड़े बदमाश का बेटा है|" लड़की ने घृणा के स्वर में कहा। “उसने अपनी पत्नी और बच्चे को छोड़ दिया है। इस पवित्र स्थान में उसका नाम लेना पाप है।"

दुष्यन्त बहुत चाह रहे थे कि बच्चे की माता के बारे में कुछ पूछे लेकिन ऐसा करने से डरते थे। तभी दूसरी तपस्विनी एक मोर का खिलौना लेकर आई। सर्वदमन ने वह खिलौना उसके हाथ से छीन लिया।

“कितना सुन्दर खिलौना है?" वह चिल्लाया। "मैं अपने शकुन्त को बहुत प्यार करता हूं," बालक बोला। 

"क्या इसे तुम्हें मेरी मां शकुन्तला ने दिया है ?" बच्चे ने अपने आपको राजा की बांहों से छुड़ाना चाहा।

वह बोला, "मुझे अपनी मां के पास जाने दो।" 

"बालक, मेरे साथ यहीं ठहरो," राजा ने धीरे से कहा, "जब वह बाहर आयेगी तो हम दोनों इकट्ठे उसका स्वागत करेंगे। मैं राजा दुष्यन्त हूँ...!"

"नहीं, नहीं,” बालक चिल्लाया, “तुम राजा दुष्यन्त नहीं हो। राजा दुष्यन्त तो मेरे पिता हैं।" 

इसी समय शकुन्तला अपने पुत्र को ढूँढ़ती हुई बाहर आई। उसने देखा कि बच्चा दुष्यन्त की गोद में है। वह अपने पति को देखकर बहुत चकित हुई। वह मूर्ति की तरह खड़ी रही। न वह हिल सकती थी और न बोल सकती थी।

सर्वदमन भागकर शकुन्तला के पास आया और उसे बाहों से घेर कर बोला, "मां, यह अजनबी कहता है कि वह राजा दुष्यन्त है। वह कौन है? क्या वास्तव में ही वह मेरे पिता हैं?"

राजा दुष्यन्त आगे बढ़े और घुटने टेककर शकुन्तला से क्षमा मांगी। फिर उन्होंने शकुन्तला को महर्षि दुर्वासा के श्राप के बारे में बताया और यह भी बताया कि अपनी अंगूठी देखने पर उन्हें कैसे सब कुछ याद आ गया। शकुन्तला समझ गई कि राजा के अभद्र व्यवहार का कारण क्या था। उसने उन्हें क्षमा कर दिया।

उसने अनुभव किया कि इसमें कुछ दोष उसका भी था। उसने ही महर्षि दुर्वासा का स्वागत नहीं किया था और उसी ने अंगूठी भी खो दी थी। महर्षि मारीच के आश्रम में आनन्द और उत्सव का वातावरण छा गया। महर्षि ने शकुन्तला और राजा दोनों को आशीर्वाद दिया। महर्षि कण्व को भी सन्देश भेज दिया गया कि शकुन्तला और दुष्यन्त का मिलाप हो गया है। 

दुष्यन्त खुशी-खुशी शकुन्तला और सर्वदमन के साथ वापिस राजधानी लौट आये।

सर्वदमन का नाम बदलकर भरत रखा गया। समय आने पर वह एक बहुत बड़ा राजा हुआ।

उस राजा के नाम पर ही हमारा देश 'भारतवर्ष' कहलाया|

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