बसंत , छः ऋतुओं में से एक ऐसी ऋतु जिसे ऋतुराज कहा जाता है । साल का ऐसा समय जिसमे हिंदी वर्ष, फागुन के साथ अपने सारे करतबों को समेट रहा होता है ,तो चैत के साथ एक नया बरस आगाज़ कर रहा होता है ।

वास्तव में ये धरती मानो अपना केंचुल छोड़ रही होती है ,पुराने को त्यागकर कुछ नवीन धारण करने के लिए , किसी कवि की वो पंक्तियां याद आती हैं-

" नवल हो कर पुराना जा रहा है, तुमको सूचित हो,
पुनः यौवन सुहाना आ रहा है, तुमको सूचित हो ।"

अंग्रेजी और भारतीय पद्धति के बारह मासों में से यूँ तो बसंत के हिस्से में मात्र दो महीने अर्थात तकरीबन साठ दिन ही आते हैं ,परंतु इन साठ दिनों में पूरा बरस अपने भीतर इतनी ऊर्जा, इतना लावण्य , स्नेह , माधुर्य ,ओज रूपी ईंधन भर लेता है जिससे आने वाले समस्त ऋतुओं में जीवन भरा जा सके ।

ये विडम्बना ही है कि वियोग और संयोग दोनों ही रस मानो इस समय प्रगाढ़ हो जाते हैं । विच्छोह की पीर और मिलन की ये नवीन आस ही इसे बसंत बनाती है । बसंत जहाँ खुशबू है एहसासों की तो सरसों के फूलों का रंग भी हैं, जहां अंगड़ाई है एक नवीन सृजन की तो दूसरी ओर एक ठहराव की इच्छा भी , इच्छा जो इस मनोरम दृश्य को आंखों में है भर लेने की, इच्छा इस अनोखी खुशबू को हृदय में जमा कर लेने की । एक नन्ही इच्छा जो चाहती है कि जीवन का आने वाला ये बरस चाहे जितने झंझावातों से गुजरे , चाहे कितने शिशिर और हेमंत शरीर के इस बाहरी आवरण को भयाक्रांत करने को तत्पर हो हृदय में तो बस बसंत ही बसता रहे ।

जी हां ये बसंत ऋतु है , बसंत अर्थात शीत ऋतु की कड़कड़ाती ठंड से निजात की उम्मीद , जब शीत ऋतु शनैः शनैः स्वयं को ग्रीष्म के आगोश में खत्म कर रही होती है , उस सत्य को आत्मसात करते हुए कि इस प्रकृति में कुछ भी स्थायी नही है , गति ही जीवन है , और एक रूप से दूसरे रूप में रूपांतरण ही एक जीवंत जीवन ।

इस अमूर्त पहलू से इतर भारत गांवों में बसता रहा है ,और इसके तीज त्योहार सभी गंवई आर्थिक गतिविधियों से जुड़ते हैं , बसंत का हर ऋतु की तरह एक महत्व जो ऋतुचक्र से जुड़ता है । यानी सरसो के पीले फूलों के बीच मुस्कुराते हुए भारत की तस्वीर , बसंत यानी कर्मो के पल्लवन का काल , जब एक किसान अपनी मेहनत , अपने सृजनशीलता को पुष्पित और पल्लवित होते देखकर आह्लादित हो रहा होता है , जब चने के मीठे दाने अपने खोल में मजबूत हो रहे होते हैं , जब मटर की लताएं किसी शोख नागिन की भांति पल्लवित हो रही होती हैं ।

इस बसंत में शरीर के अंदर की जैवीय संरचना भी परिवर्तित हो रही होती है । पुराने को त्यागकर नवीन को पाने की ये अभिलाषा ही इसे बसन्त बनाती है , ये वक़्त होता है नवीन प्रण को अभिप्राणित करने का , ये समय होता है जीवन की अप्रतिम अनुभूतियों का ,जिसमे प्रेम, उल्लास, उत्सव , ऊर्जा ,ओज , आह्लाद सभी एहसासी शब्द मानो जीवंत हो नृत्यरत हो उठते हैं । जब मन स्वयं की अनंत संभावनाओं से साक्षात्कार कर रहा होता है और ऊर्जा से ओत प्रोत हो अपना सर्वश्रेष्ठ देने को तत्पर रहता है , इसीलिए इसी वक्त में परीक्षाओं का समय होता है , जिससे एक विद्यार्थी वर्ष भर की अपनी सीख का निचोड़ सबके समक्ष प्रस्तुत कर सके । बसंत की महिमा अनंत की गाथा का विराम बिंदु ढूंढना स्वयं में ही एक दुष्कर कार्य है , आप सभी के लिए यह बसंत अपनी प्रकृति के अनुसार ही रोम रोम भर बस जाए , एक नव विहान के संधान के लिए आप सभी ऊर्जावान हो , इस आकांक्षा के साथ आपका शुभेक्षु ~

Writer- Ritesh Ojha
From- Delhi
Contact - aryanojha10@gmail.com

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