त्योहार दीवाली का हो तो मन वीणा के तार झंकृत ना हो जाये ऐसा संभव कैसे हो सकता है ।

त्योहार की संकल्पना वास्तव में भारतीय परंपरा का एक अद्भुत पहलू है , जिसमे अंतरिक्ष की ज्यामिति , भूगोल की तारतम्यता , इतिहास की परिघटना , अर्थशास्त्र की खनखनाहट, विज्ञान का संतुलन, मनोवैज्ञानिक बोधगम्यता आदि के दृष्टिगत अलौकिक मेल परिलक्षित होता है ।

ऐतिहासिक आख्यान में यदि कोई मर्यादा शिरोमणि किसी बुराई का संहार कर अपने गृहभूमि पर आकंठ भाव से स्वागत प्राप्त कर रहे हैं तो भौगोलिक ज्यामिति में यह आर्द्र ऋतु द्वारा अपनी प्रभाव शक्ति को समेटकर जलवायवीक प्रभुत्व की बागडोर को शरद ऋतु को हस्तांतरित करने की प्रक्रिया है , और इस संक्रमण वाली  अवस्था से बचने के लिए विज्ञान अपने तीक्ष्ण चक्षुओं से निरीक्षण में रखकर मानवीय सभ्यता को व्यधियों आदि से सजग रहने की हिदायत भी दे रहा होता है । वही अर्थ के क्षेत्र में ये खरीफ के फसलों की आमद को समेटकर और उत्साहित होकर नवीन निवेशों को संचारित करने का कालखंड होता है जिसमे रबी की फसलों की तैयारियां अपने चरम पर होती है ।

ऐसे में एक ऐसे सर्व समेकित आयोजन की आवश्यकता हो ही जाती है जिसमे सभी जनसाधारण के हित एकरुपिय हो जाये । जहां अवसादों का शमन हो सके , एक अरसे से उलझते जा रहे रिश्तों की उलझन की गांठ को थोड़ी ढील मिल सके । अंतस का ब्रह्मांड बाहर के ब्रहांड से योजित हो सके । जहां दो चेतनाएं एक दूसरे से गले मिलकर अपनी अखंडता की अनुभूति को महसूस कर सके । फिर ऐसे ही आयोजन के किये दीपावली अपरिहार्य हो जाती है ।

दीपावली का त्योहार एक ऐसा ही आयोजन है जो जीवन के असंतुलित साजो को उचित साज दे सके , जो बेसुरे लय को सुरीली तान दे सके , जिसमे अवसादों को एक सरसता मिल जाये , मद्धिम होती चाल को एक त्वरण मिल जाये , तो अंधाधुंध भांगते धूपते कदमों को एक मादकता भरी मंदन भी । आशा है इस पर्व की महत्ता को सिर्फ पटाखों के शोर , और रौशनी की चकाचौंध में ही विलीन न समझकर इसकी आध्यत्मिक , दार्शनिक उपयोगिता के व्यापक अर्थों में समझकर दीवाली को सिर्फ मनाया न जाये बल्कि इसे गहनतम रूप में जिया जाए  ~ प्रत्येक दीपावली का प्रत्येक दीप
सभी के जीवन में ज्ञान और समृद्धि का प्रकाश अनवरत लाये , इसी इच्छा के साथ आपका शुभेक्षु ~

Writer - Ritesh Ojha
Place - Delhi, India
Contact - aryanojha10@gmail.com

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