सच्चंकिर जातक की गाथा – [बुद्धिमानों ने ठीक ही कहा है कि बहती हुई लकड़ी को धारा में से निकालना एक (अकृतज्ञ) मनुष्य को उबारने की अपेक्षा कहीं अच्छा है।]

वर्तमान कथा – देवदत्त की दुष्टता
धर्मसभा में बैठे भिक्षुगण एक बार आपस में बातें कर रहे थे कि “देखो, यह देवदत्त कितना नीच है। भगवान के द्वारा प्रतिकार न किये जाने पर भी वह उनका वध कराने का प्रयत्न कर ही रहा है।”

भगवान बुद्ध ने भिक्षुओं की बात सुनकर कहा, “यह देवदत्त केवल इसी जन्म में ऐसा कर रहा है, यह मत समझना। पूर्व जन्म में भी यह ऐसा ही करता था।” भिक्षुओं के आग्रह पर भगवान ने पूर्व जन्म की “ब्राह्मण और दुष्ट राजा” की कहानी सुनाई।

अतीत कथा – ब्राह्मण व कृतघ्न दुष्ट राजा
पूर्व जन्म में काशिराज के घर एक दुष्ट स्वभाव का पुत्र उत्पन्न हुआ। लोग उसे दुष्टकुमार कहते थे। वह किसी के साथ अच्छा व्यवहार न करता था। लोगों को अपमानित करके भाँति-भांति के कष्ट भी देता था। प्रजाजन तथा कर्मचारी सभी उससे असंतुष्ट थे।

एक दिन गंगा की धारा उमड़ रही थी। दुष्टकुमार ने हठ किया कि “इसी समय मुझे बीच धारा में ले चलकर नहलाओ।” सेवकों ने प्रयत्न करके उसे बीच धारा में पहुँचाया। उमड़ी हुई जलधारा को देख सेवकों ने सोचा, इस दुष्ट से छुटकारा पाने का यह अच्छा अवसर है और उसे वहीं छोड़ लौट गए। दुष्टकुमार रोता-चिल्लाता नदी की वेगवती धारा के साथ बह चला।

राजा के पूछने पर सेवकों ने सलाह करके उत्तर दिया कि “कुमार घाट पर नहीं थे। वर्षा के कारण लौट आए होंगे।” राजा ने कुमार की खोज कराने के लिये बहुत-से अनुचरों को नियुक्त किया।

इधर दुष्टकुमार को नदी में बहता हुआ एक बड़ा लक्कड़ दिख गया। वह प्रयत्न करके उस पर जा बैठा और धारा के साथ बहने लगा। थोड़ी दूर जाने पर पानी से अपनी रक्षा करने के लिये एक सर्प, एक चूहे और एक तोते ने भी उसी लक्कड़ पर आश्रय ग्रहण किया। धारा में डूबने के भय से दुष्टकुमार पहले ही घबड़ाया हुआ था। अब विषधर सर्प को अपनी बगल में देख वह और भी भयभीत हो गया और जोर-जोर से चिल्लाने लगा।

उस समय भगवान बोधिसत्व एक ब्राह्मण परिवार में जन्म ले गंगातट पर कुटी बनाकर रहते थे। मनुष्य का क्रन्दन स्वर सुन वे तट पर गए और लक्कड़ पर बैठे हुए उन चारों प्राणियों की दुर्दशा देखी। दया से उनका हृदय भर उठा और उन्होंने धारा में घुसकर बड़े यत्न से उस लक्कड़ को किनारे पर लाकर उन चारों की रक्षा की।

स्वस्थ होने पर चारों प्राणी अपने-अपने घर को चल दिये। चलते समय सर्प बोला, “हे उपकारी! मेरे पास चालीस कोटि स्वर्ण मुद्राएँ हैं। मैं बड़े यत्न से आज तक उनकी रक्षा करता रहा हूँ। यदि वह धन आपके काम आ सके तो आप जब चाहें ले सकते हैं।”

चूहे ने कहा, “हे दयामय! मेरे पास भी तीस कोटि स्वर्ण मुद्राएं हैं। आप जब चाहें उन्हें ले सकते हैं।”

तोते ने कहा, “देव! मेरे पास स्वर्ण तो नहीं है। परंतु मैं आप को लाल धन दे सकूँगा।”

बोधिसत्व ने सब का पता ठिकाना पूछ उन्हें बिदा किया।

दुष्टकुमार को सर्प, तोते और चूहे के साथ होने वाला सद्व्यवहार अच्छा न लगा। उसने मन में कहा, “यह ब्राह्मण मुझे भी क्षुद्र जीवों के समान समझता है। इसने मेरा बड़ा अपमान किया है। मैं इसे इसका मजा चखाऊंगा।” प्रत्यक्ष में उसने ब्राह्मण से केवल इतना ही कहा, “जब मैं राजा होऊँ उस समय आप काशी अवश्य आइयेगा।”

बहुत दिन बीत जाने पर बोधिसत्व को इन चारों मित्रों का फिर ध्यान आया। उनकी परीक्षा लेने के लिये वे पहले सर्प के निवास-स्थान पर गए और उसे पुकारा। सर्प ने बाहर आकर भगवान को प्रणाम किया और कहा, “मेरा समस्त धन आपके लिये अर्पित है।” भगवान ने कहा अभी आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार चूहे और तोते की भी परीक्षा लेकर उन्हें अपने वचन पर दृढ़ पाया। अंत में वे दुष्ट राजा की परीक्षा लेने काशी गए।

राजा उस समय हाथी पर बैठकर नगर में ठाटबाट से घूम रहा था। उसने दूर से ही देखकर उस ब्राह्मण को पहचान लिया। वह उससे बात नहीं करना चाहता था जिससे उसके उपकार की बात लोगों को न मालूम हो सके।

अपने सैनिकों को उसने ब्राह्मण को मारते हुए नगर से निकालने का आदेश दिया। जब बोधिसत्व पर मार पड़ती थी उस समय वे रोते न थे; केवल उपरोक्त गाथा का पाठ करते थे कि बहती हुई लकड़ी को धारा में से निकालना एक (अकृतज्ञ) मनुष्य को उबारने की अपेक्षा कहीं अच्छा है। यही “ब्राह्मण और दुष्ट राजा” कहानी का सार भी है।

भीड़ में कुछ पंडित भी थे। उन्होंने उसका अर्थ समझने के लिये सैनिकों को रोककर बोधिसत्व से बातचीत की। जब लोगों को राजा की कृतघ्नता की बात मालूम हुई, तो सैनिकों समेत जनता ने विद्रोह कर दिया। वे पहले से ही उसके अत्याचारों के मारे परेशान थे।

दुष्ट राजा मारा गया और बोधिसत्व को काशी के राज सिंहासन पर बिठाया गया। सर्प, चूहे और तोते ने अपनी-अपनी भेंट यथा-समय बोधिसत्व के चरणों में उपस्थित कर दी।

भगवान बुद्ध ने कहा, “वही दुष्ट राजा इस जन्म में देवदत्त होकर उत्पन्न हुआ है।”

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