पदुम जातक की गाथा –

१. [“बार-बार कट-छँट कर भी मूँछें और दाढ़ियाँ फिर उग आती हैं, तुम्हारी नाक भी इसी भांति फिर से उग आयेगी, कृपया हमें एक कमल-पुष्प प्रदान कीजिये।”]

२. [“हेमन्त में बीज बोए जाते हैं, जो बहुत दिनों बाद अंकुरित होते हैं। भगवान करे तुम्हारी नाक भी इसी प्रकार उग आवे, कृपया हमें केवल एक कमल ही प्रदान कर दीजिये।”]

वर्तमान कथा – आनंद-वृक्ष की पूजा के कमल
जेतवन के प्रसिद्ध विहार के समीप भगवान के प्रसिद्ध शिष्य आनंद ने एक वृक्ष का आरोपण किया था। उन्हीं के नाम पर इस वृक्ष का नाम आनन्द-वृक्ष पड़ गया। भक्तगण जो बड़ी-बड़ी यात्राएँ करके जेतवन तक आते थे, आनंदवृक्ष का भी पूजन करते थे।

जेतवन श्रावस्ती के निकट ही था। वहीं के कमल-बाजार से ये भक्तगण पूजा के लिये कमल के फूल ले आते थे। एक बार यात्रियों ने आनंद से निवेदन किया कि उन्हें प्रयत्न करने पर भी श्रावस्ती के बाजार में फूल नहीं मिले। इस पर श्वानंद ने स्वयम् श्रावस्ती जाकर फूल ला दिये।

जब भगवान बुद्ध गन्धकुटी में आसन पर पधारे, उस समय भिक्षुओं ने इसकी चर्चा उनसे की तो उन्होंने हँसकर कहा, “वाणी की कुशलता द्वारा कमल प्राप्त करने का यह प्रथम अवसर ही नहीं है। इससे पूर्व भी ऐसा ही हो चुका है।” ऐसा कहकर उन्होंने नीचे लिखी “सत्य का प्रभाव” नामक कथा सुनाई–

अतीत कथा – सत्य का गहन प्रभाव
ब्रह्मदत्त के राज्य काल में एक बार बोधिसत्व का जन्म बनारस में एक बहुत धनी व्यापारी के घर हुआ। व्यापारी के दो और भी पुत्र थे। एक दिन अवकाश का लाभ उठा वे तीनों नगर के प्रसिद्ध सरोवर से कमल-पुष्प लाने गए।

उस सरोवर का रक्षक नकटा था। कमल उसी से प्राप्त करने होते थे। सबसे बड़े भाई ने नकटे के पास जा, उसे प्रसन्न करने के उद्देश्य से प्रथम गाथा कही – “बार-बार कट-छँट कर भी मूँछें और दाढ़ियाँ फिर उग आती हैं, तुम्हारी नाक भी इसी भांति फिर से उग आयेगी, कृपया हमें एक कमल-पुष्प प्रदान कीजिये।”

इसे सुन वह बहुत बिगड़ा और उसको कमल देने से इनकार कर दिया। इसके पश्चात् दूसरे भाई ने दूसरी गाथा सुनाकर उससे कमल प्राप्त करने का प्रयत्न किया। उसने दूसरी गाथा इस प्रकार कही – “हेमन्त में बीज बोए जाते हैं, जो बहुत दिनों बाद अंकुरित होते हैं। भगवान करे तुम्हारी नाक भी इसी प्रकार उग आवे, कृपया हमें केवल एक कमल ही प्रदान कर दीजिये।”

परन्तु नकटे ने चिढ़कर उसे भी मना कर दिया। इसके पश्चात् बोधिसत्व ने उसके निकट जाकर कहा–

“वे मूर्ख हैं, जो समझते हैं कि कमल इस प्रकार प्राप्त हो जायेंगे। कोई चाहे कुछ भी कहे, परन्तु कटी नाक फिर नहीं उगेगी। देखिए, मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ। कृपया मुझे केवल एक कमल ही दे दीजिये।”

नकटे सरपाल पर बोधिसत्व के सत्य का प्रभाव पड़ा। उसने कहा, “भाई! तुम मुझे सच्चे मालूम होते हो, परन्तु तुम्हारे दोनों भाई तो एकदम लफंगे हैं।”

ऐसा कहकर उसने नील कमलों का एक बड़ा गुच्छा बोधिसत्व के हाथ पर रख दिया।

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