कानपुर में रहते-रहते जीवन ऊब-सा गया। नित्य वही दिनचर्या, नित्य वही लोग और नित्य वही क्लब की सन्ध्या। मन हो रहा था कि छुट्टी लेकर इंग्लैंड दो-तीन महीने के लिये हो आऊँ। धीरे-धीरे गर्मी भी बढ़ रही थी। परन्तु अभी छुट्टी नहीं मिल सकती थी। कर्नल साहब ने एक दिन क्लब में मुझे उदास देखकर कहा कि तुम्हारा स्वास्थ्य ठीक नहीं है। मैंने उन्हें सब बातें बता दीं। उन्होंने कहा कि तुम पहली बार इस देश में आये हो, यहाँ की गर्मी सह न सकोगे, पहाड़ पर चले जाओ। मेरे मन में बात बैठ गयी।

रेलवे कम्पनी को लिख, अनेक पहाड़ी नगरों के सम्बन्ध में साहित्य एकत्र किया। कई पुस्तिकायें भी एकत्र कीं। उन्हें पढ़ने से जान पड़ा कि सभी पहाड़ियाँ स्वर्ग के समान हैं। शिमला पर पुस्तक पढ़ने से जान पड़ा कि संसार में शिमला से बढ़कर कोई पहाड़ है ही नहीं।

परन्तु जब दार्जलिंग के सम्बन्ध में पढ़ने लगा तब समझ में आया कि दार्जलिंग के सामने सभी पहाड़ तुच्छ हैं। इसी प्रकार जब जो पुस्तक पढ़ता, जान पड़ता है कि यही नगर सबसे उत्तम गर्मी का समय बिताने योग्य है।

मैं दो बातों की ओर ध्यान देता था ऐसा पहाड़ हो जहाँ नाच की अच्छी सुविधा हो, गौल्फ और क्रिकेट खेलने की अच्छी व्यवस्था हो, शराब खूब मिलती हो और भारत के सम्बन्ध में अध्ययन करने के लिये कुछ अवसर मिले। मैंने बनारस के सम्बन्ध में रायल जियोग्राफिकल सोसाइटी के पास एक लेख भेजा था जिसकी बड़ी प्रशंसा हुई और उनकी त्रैमासिक पत्रिका में वह लेख प्रकाशित भी हुआ। मैं इस देश के सम्बन्ध में और भी लिखना चाहता था, इसलिये यहाँ के विख्यात स्थान और पुराने ऐतिहासिक स्थानों को देखने की भी बड़ी लालसा थी।

मैं स्वयं निश्चय नहीं कर सका कि कहाँ जाना चाहिये, कर्नल साहब से पूछा। उन्होंने कहा कि देखो, उसी पहाड़ पर जाना चाहिये, जहाँ हिन्दुस्तानी लोग कम जाते हों। मैंने कहा कि हिन्दुस्तानी लोग कुछ छीन तो लेंगे नहीं और मैं इनके सम्बन्ध में कुछ जानना चाहता हूँ। यदि ऐसे स्थान पर जाऊँ जहाँ यह लोग भी हों तो पीछे बहुत-सा काम निकल सकता है। कर्नल शूमेकर ने कहा कि यह सबसे बड़ी भूल होगी। यदि हम उनसे मिलने-जुलने लगेंगे तो हम उन पर शासन नहीं कर सकेंगे। जिन पर शासन करना हो उनसे कभी हिल-मिलकर नहीं रहना चाहिये और जो बातें उनकी अच्छी भी हों उन्हें भी यही कहना चाहिये कि यह किसी काम की नहीं है। मैंने कहा कि यह तो झूठी बात होगी, अच्छी बात को बुरी बात कहना। कर्नल साहब ने कहा कि यदि झूठ बोलने से वेतन अच्छा मिले तो कोई पाप नहीं और एक बात तुम नहीं जानते। ऐसा कहते-कहते स्वयं भारतवाले विश्वास करने लगते हैं कि इन्हीं की बात सच होगी। इसलिये हमारे देश के कितने ही लोगों ने किताबें लिखी हैं। जिनमें मनमाना लिख दिया है और भारतवासी उसी को प्रमाण मानने लगे हैं। यदि तुम आज एक पुस्तक लिख दो और उसमें लिख दो कि मद्रास में एक पत्थर मिला है जिस पर एक लेख लिखा था, जो अब घिस गया है, कि उनके बड़े भारी राजा का नाम राम इसलिये पड़ा कि वह रोम से आये थे तो भारत के सब विद्वान इसे मान लेंगे और कालेज तथा स्कूल की सब पुस्तकों में वही छापा जायेगा।

जो चतुर हैं वह इसी पर एक ग्रन्थ लिख डालेंगे और कहेंगे कि किसी पुराण में भी इसका संकेत आया है, किसी शास्त्र में भी और विश्वाविद्यालय से उन्हें डाक्टरेट की उपाधि भी मिल जायेगी। मैंने कहा - 'किन्तु हम लोग इंग्लैंड में कहते हैं कि भारतवासियों को हम स्वराज्य के लिये शासन सिखला रहे हैं। ऐसी अवस्था में उन्हें पथभ्रष्ट करना कहाँ तक ठीक होगा?'

कर्नल साहब बोले कि कहने के लिये जो जब चाहे कह दो, फिर उसे बदल सकते हो। तुम जानते नहीं। यह हमारी जाति की विशेषता है। परिवर्तन जीवन है, स्थिरता मृत्यु। सरिता में जीवन है, पहाड़ में मृत्यु।

मैं तो पहाड़ के सम्बन्ध में पूछने गया था और विषयान्तर होने लगा।

मैं विषय बदलने वाला ही था कि कैप्टन-बफैलो 'पायनियर' की प्रति लिये हुए आये ओर बड़ी शीघ्रता से बोले - 'कर्नल साहब, मैं बरबाद हो गया।

कर्नल साहब ने कहा - 'बात क्या है?' बफैलो साहब ने कुछ कहा नहीं केवल समाचार पर उँगली दिखायी। समाचारपत्र में 27 अप्रैल का तार कानपुर के संवाददाता का छपा था कि श्रीमती बफैलो सत्रहवीं मराठा राइफल नाम की पलटन के कप्तान शेपर्ड के साथ भाग गयी।

कर्नल साहब ने कहा कि बात क्या है? बफैलो साहब ने कहा कि मैं शिकार के लिये चार दिनों से बाहर था। कल रात मैं देर से लौटा। सवेरे पत्नी के स्थान पर यह समाचार मिला। अब क्या करना चाहिये?

कर्नल साहब बोले - 'करना क्या चाहिये?' विवाह-विच्छेद की एक अर्जी कचहरी में देनी चाहिये और दूसरे विवाह के लिये चेष्टा करनी चाहिये।'

मैंने कहा - 'किन्तु यह तो जानना चाहिये कि कारण क्या है? और क्यों कैप्टन शेपर्ड के साथ वह भागी। इस समाचार में कहाँ तक सच्चाई है; यह भी जानना आवश्यक है।'

कर्नल साहब ने कहा कि इस पर बेकार समय नष्ट करना है। स्त्रियों का भाग जाना ही स्वाभाविक है, घर में रहना ही अस्वाभाविक है। रह गयी दूसरे विवाह की बात। कैप्टन बफैलो, तुम्हारी क्या उम्र है? कैप्टन ने कहा कि उन्तीस वर्ष, सात महीने, तीन दिन। कर्नल साहब बोले - 'तुम तो कप्तान होने योग्य नहीं हो। मेरा जब विवाह हुआ तब मैंने पत्नी से कह दिया - देखो, यदि तुम मुझे छोड़ोगी तो मैं दूसरे ही दिन दूसरा विवाह कर लूँगा और इससे कुछ मतलब नहीं कि किससे। यदि सौ स्त्रियाँ छोड़ेंगी तो सौ विवाह करूँगा। फल यह हुआ कि आज सैंतालीस साल विवाह के हो गये पर कभी अलग होने की बात नहीं आयी।'

मैंने कहा - 'इसीसे मैंने विवाह नहीं किया।'

कर्नल ने कहा - 'विवाह कोई करता नहीं। हो जाता है।' और फिर बफैलो महोदय की ओर उन्होंने संकेत करके कहा कि आप अमुक बैरिस्टर से मिलिये और आज ही कचहरी में दरखास्त दे दीजिये।

जब बफैलो चले गये, मैंने कर्नल से कहा कि आपने सहानुभूति नहीं दिखायी। बड़ा रूखा बरताव दिखाया। उन्होंने कहा कि एक बार की बात हो तो सहानुभूति दिखा दूँ। अभी कितनी बार उनकी पत्नी भागेगी, कितनी बार विवाह-विच्छेद होगा, कहाँ से इतनी सहानुभूति लाऊँ? जैसे प्रति वर्ष या दूसरे वर्ष हम लोग अपनी वर्दी बदल देते हैं, सेना के अफसर अपनी पत्नियाँ बदलते हैं और उनकी पत्नियाँ अपने पति, यही मैं इतने दिनों की नौकरी में देखता चला आ रहा हूँ।

मैंने कहा - 'अच्छा है। मैं अपना जीवन अविवाहित ही बिताऊँगा। देर हो रही है। मुझे आप यह बता दें कि मेरे स्वास्थ्य की दृष्टि से और मनोरंजन की दृष्टि से भी किस पहाड़ पर जाना उचित होगा?'

कर्नल साहब ने कहा - 'मुझे पहाड़ों का विशेष अनुभव नहीं है। मैं तो दो-एक बार पहाड़ पर गया हूँ। गर्मी के दिनों में दिन-भर खस की टट्टी में रहता हूँ। पंखा चला करता है और बर्फ और बियर पीता रहता हूँ। परन्तु तुम्हारे लिये अभी यह ठीक नहीं होगा। तुम्हारे लिये शिमला, नैनीताल या मसूरी ठीक हो सकता है। डलहौजी अच्छी जगह है, किन्तु वहाँ मनोरंजन नहीं है। लैन्सडाउन भी ठीक है, किन्तु वह भी तुम्हें अच्छा नहीं लगेगा।'

मैंने कहा - 'मैं वहीं जाना चाहता हूँ जहाँ भारत के जीवन के अध्ययन करने का अवसर मिले। मैं धीरे-धीरे भारत की ओर आकृष्ट होने लगा हूँ।'

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