मेरे जीवन में आज तक विचित्र घटना घटी, जिसने मेरे मन और विचार में ज्वार-भाटा उत्पन्न कर दिया। मैं चाय पी रहा था। नौकर ने अखबार लाकर रख दिया। मैं समाचारपत्रों के पढ़ने में विशेष समय नहीं बरबाद करता। समाचारपत्र तो महाजनों तथा सेठ-साहूकारों के लिये है, जिन्हें कोई काम नहीं है। भोजनोपरान्त तकिये के सहारे लेट गये और आदि से अन्त तक बिना मतलब की बातें पढ़ रहे हैं। लोग समझते हैं कि सरकार के कार्यों की आलोचना निकलती है और सरकार के मत के अनुसार वह नहीं चलते, उनके मत के अनुसार सरकार चलती है। जैसा चाहते हैं, सरकार से करा लेते हैं, उनके विरोध में सरकार जा नहीं सकती। हम लोग तो अखबार इसलिये देखते हैं कि किसके यहाँ आज विवाह-विच्छेद हुआ और किससे किसका विवाह लगा। जब से भारत में आया हूँ, मैं केवल दो बातें समाचारपत्रों में देखता हूँ। एक तो फुटबाल तथा हॉकी के खेलों के सम्बन्ध में बड़ी उत्सुकता रहती है, दूसरे अपने देश की घुड़दौड़ के सम्बन्ध में जानने की इच्छा रहती है।

इन्हीं बातों को देखने के लिये मैंने 'सिविल ऐण्ड मिलिटरी गजट' उठाया। यकायक बड़े मोटे-मोटे अक्षरों में यह पढ़ा कि अंग्रेजी राज्य के प्रति बड़ा भारी षड्यंत्र। यों ही मैं उन लेखों को पढ़ने लगा। ऐसा तो कभी लेख इत्यादि मैं पढ़ता नहीं। उसमें लिखा था कि मिस्टर गांधी ने अंग्रेजी सरकार से अहसयोग करने का विचार किया है। यही समझ में नहीं आया कि असहयोग कैसे किया जा सकता है। लेख मैंने और आगे पढ़ा।

सम्पादक ने बताया था कि मिस्टर गांधी सरकार से किसी प्रकार का सम्पर्क नहीं रखेंगे। सरकारी कानून का विरोध करेंगे और कहते हैं कि हम किसी प्रकार के हथियार का प्रयोग नहीं करेंगे। सरकार को इसके मुकाबले के लिये तैयार रहना चाहिये।

सम्पादक ने यह भी बताया था कि अंग्रेजों के लिये यह परीक्षा का समय है। सेना में और वृद्धि करनी चाहिये और जितने नेता हैं, उन्हें भारत के बाहर किसी टापू में भेज देना चाहिये।

मैंने मिस्टर गांधी का नाम पहले भी सुना था। उनके सम्बन्ध में तीन-चार बार पढ़ा भी था। एक बार तो एक अंग्रेजी पत्र में उनकी जीवनी निकली थी, जिसमें लिखा था कि यह कोई फकीर जादूगर हैं। इनके हाथ में एक लाठी रहती है, जिसमें एक प्रकार का जादू रहता है। जो इनके सामने जाता है, उसे इस लाठी से यह छू देते हैं और वह सब बातें भूल जाता है और उसका दिमाग खराब हो जाता है। फिर जो यह कहते हैं, वही करने लगता है। यह कुछ खाते नहीं। एक बकरी पाल रखी है। यह भी लिखा था, जादू सीखने से पहले यह इंग्लैंड भी गये थे और वहाँ कानून पढ़ा था। कोई अंग्रेज इनसे मिलने नहीं जाता। यदि कोई जाये तो वह इसी लाठी से छूकर उसे चेला बना देते हैं। वह फिर लौटता नहीं, एक गुफा में उन्हीं के साथ रहने लगता है।

दूसरी बार मैंने पढ़ा था कि वह बड़े भारी क्रान्तिकारी हैं। छिपे-छिपे इन्होंने हजारों बम और लाखों मन बारूद एकत्र किया है। भारत सरकार से यह लड़ाई की तैयारी कर रहे हैं।

फिर मैंने इनके विषय में कभी ध्यान नहीं दिया था। आज के लेख में मैंने यह पढ़ा कि यह सरकार का विरोध करने के लिये एक योजना तैयार कर रहे हैं और कहते हैं कि हमारी ओर से किसी प्रकार की हिंसा नहीं होनी चाहिये और यदि हमारे ऊपर हिंसा हो तो सह लेनी चाहिये। मैंने तो पहले समझा था कि यह राबिनहुड के समान कोई डाकू होंगे। किन्तु इसमें कुछ चाल अवश्य है, जब वह कहते हैं कि हम हिंसा नहीं करेंगे। शायद हम लोगों को धोखे में डालना चाहते हैं कि हम लोग अचेत रहें और हम लोगों पर हमला कर दिया जाये। किन्तु हम लोग इतने मूर्ख नहीं हैं। हम लोगों ने बड़े-बड़े साम्राज्य बनाये हैं। सब समझते हैं। हम लोगों को कोई धोखा नहीं दे सकता।

हमारे मन में विचार की तरंगें उठने लगीं। देखिये हम लोगों ने भारत का कितना भला किया है। केवल तीन-तीन पैसे में सारे भारत में चिट्ठियाँ भिजवा देते हैं, रेल चलायी है, पानी का कल लगवा दिया है, सेफ्टी-रेजर प्रयोग करना सिखाया है, बाँस की कलम के स्थान पर फाउण्टेन पेन का इस्तेमाल बताया, पाव-रोटी कैसे खायी जाती है बताया। फिर भी धन्यवाद देने के स्थान पर हमारा विरोध। मनुष्य में कितना स्वार्थ भरा है! हम लोगों का त्याग अद्भुत है। देखिये हम इंग्लैंड में धोती बनाते हैं, किसके लिये? इंग्लैंड में कौन धोती पहनता है। केवल भारतीयों के लिये। फैल्ट की टोपी बनवाते हैं केवल इनके लिये। ओह, यह लोग अपना लाभ नहीं समझते। चाहते हैं कि हम लोग यहाँ से चले जायें।

सुना है कि इन्होंने कोई टोपी आविष्कार की है। वह टोपी लगा लेने से सिर पर लाठी की चोट नहीं लगती। कहीं बहुत-से लोग ऐसी ही टोपी लगाये सभा कर रहे थे। उन पर लाठी चलायी गयी तो उन्हें कुछ पता ही नहीं चला। वह हटे नहीं। इस टोपी का क्या रहस्य है, किसी वैज्ञानिक को पता लगाना चाहिये। ब्रिटिश सेना ऐसी टोपी क्यों न धारण करे, युद्ध में काम देगी।

यही सब बातें मैं सोचने लगा। सोचते-सोचते मैंने दो बातें निश्चय कीं। एक तो यह कि इन्हें किसी प्रकार देखना चाहिये। दूसरी यह कि इतना विरोध तो बड़ी सरलता से मिट सकता है। मैं इसका उपाय बताता हूँ। इन्हें इस साल सम्राट के जन्मोत्सव पर कोई बड़ी पदवी दे दी जाये। जी.सी.एस.आई. से काम चल जायेगा। तब यह शान्त हो जायेंगे। कुछ पेंशन भी देनी चाहिये। चुपके से कह दिया जायेगा; किसी को पता नहीं चलेगा और सुना है कि इन्हें बकरी बड़ी प्रिय है। सरकार की ओर से सौ बकरियाँ इनको भेंट कर दी जायें, तब तो यह किसी भी अवस्था में सरकार का विरोध नहीं करेंगे या प्रति वर्ष कुछ बकरियाँ भेंट की जायें। मैं भारत सरकार को अपना मत लिख भेजूँगा। सफलता अवश्य मिलेगी और यदि सफलता मिली तो मुझे भी इसका अच्छा पुरस्कार मिलेगा।

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