वसन्तसेना तुरन्त तैयार हो गई। वह अपने गहने नहीं पहनना चाहती थी। उसने सोचा वह उन्हें सायंकाल को लौटते हुए लेती जायेगी। वह बैलगाड़ी की राह देखने लगी। थोड़ी देर बाद ही एक बैलगाड़ी आई और चारुदत्त के घर के सामने खड़ी हो गई। वसन्तसेना ने सोचा कि यह चारुदत्त द्वारा भेजी हुई बैलगाड़ी है। वह जाकर उसके भीतर बैठ गई। लेकिन वह चारुदत्त की गाड़ी नहीं थी, संस्थानक की थी। संस्थानक पहले ही फूलबाग पहुंच चुका था| अपने लौटने के लिए उसने अपनी बैलगाड़ी को वहाँ पहुंच जाने का आदेश दिया था।

चारुदत्त के घर के आगे रास्ता बन्द था इसलिए उस बैलगाड़ी को रुकना पड़ा। गाड़ीवान उतर कर यह देखने चला गया कि रास्ता क्यों रुका हुआ है। एक बैलगाड़ी का पहिया रेत में धंस गया था। बहुत से गाड़ीवान वहाँ इकट्ठे हो गये थे। उन्होंने गाड़ी के पहिये को बाहर निकालने में सहायता की। रास्ता फिर चलने लगा।

संस्थानक का गाड़ीवान जब लौटा तो उसने गाड़ी में एक स्त्री को बैठे देखा और पूछा कि “आप कौन है?” 

“क्यों? मैं वसन्तसेना हूँ। क्या तुम्हें मुझे फूलबाग ले जाने की आज्ञा नहीं मिली है?" वसन्तसेना ने उत्तर दिया।

गाड़ीवान जानता था कि उसका स्वामी वसन्तसेना में दिलचस्पी रखता है। उसे यह भी पता था कि वसन्तसेना ने उससे मिलने से इनकार कर दिया था। उसने सोचा कि शायद इस देवी ने अपना विचार बदल लिया है और अब संस्थानक से मिलना चाहती है।

वह बोला, “हाँ, देवी ! मैं जानता हूँ कि आप फूलबाग पहुंचने के लिए उत्सुक हैं । मैं आपको जल्दी से वहाँ ले चलता हूँ।" उसने गाड़ी को खूब तेज़ी से हाँक दिया।

इतने में चारुदत्त की गाड़ी उसके द्वार पर आ गई। वह बन्द गाडी थी। गाड़ीवान और बैठनेवाले के बीच में पर्दा था। गाड़ीवान को लगा कि कोई गाड़ी में चढ़ा है। उसने विश्वास कर लिया कि वह वसन्तसेना ही है। लेकिन वह वसन्तसेना नहीं थी बल्कि आर्यक नाम का एक आदमी था। वह क्रान्तिकारी था। हालाँकि, वह चरवाहा था फिर भी बहुत प्रसिद्ध था और उसके ढेर सारे अनुयायी थे। वह सरकार के विरुद्ध क्रान्ति करने की योजना बना रहा था और ठीक अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।

सरकार आर्यक की शक्ति को जानती थी और यह भी जानती थी कि वह जनता को भड़काना चाहता है। इससे पहले कि वह ऐसा कर सकता उसे पकड़कर जेल में डाल दिया गया था। जेल के भीतर भी वह चुप नहीं बैठा। उसने अपने निकल भागने का प्रबन्ध कर लिया था और यह फूलबाग में होने वाले उत्सव के समय होना था और वह सचमुच भाग निकला। बेड़ियों से तो वह मुक्ति पा चुका था किन्तु एक हाथ और एक पैर में जंजीर बंधी रह गई थी। वह नगर से बाहर जा रहा था कि उसने चारुदत्त की बैलगाड़ी देखी और वह उसमें घुस गया।

गाड़ीवान ने उसी जंजीर की आवाज़ सुनी और उसे वसन्तसेना समझ लिया। उसने जल्दी से गाड़ी फूलबाग की ओर हाँक दी। चारुदत्त उत्सुकता से वसन्तसेना की राह देख रहा था। जब उसकी गाड़ी वहाँ पहुंची तो वह और मैत्रेय भागकर वसन्तसेना का स्वागत करने के लिए आगे आये। उन्होंने गाड़ी के भीतर झांका| वहाँ सुन्दरी वसन्तसेना नहीं थी बल्की एक दाढ़ीवाला आदमी बैठा था।

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