राजस्थानी  चित्रांकन का एक प्रमुख प्रकार है पड़ चित्राकन इस चित्राकन में मुख्यत: कपडे पर लोकदेवता पाबूजी और देवनारायण की जीवन लीला चित्रित की हुई मिलती है। इन पेडों के भोपे गाव-गांव इस फैलाकर रात्रि को विशिष्ट गाथा गायकी में पड वाचन करते हैं। इससे पड़ भक्त जाह अपनी मनौती पूरी हुई समझते हैं वहीं भावी अनिष्ट से भी अपने को बचा हुआ मान बैठते है। इन्हीं पड़ों में एक पड़ माताजी की होती है। इस पड़ का किसी प्रकार कोई वाचन नहीं किया जाता! बावरी लोग इसके पुजारी होते हैं और अपनी जात में इसी पड की साक्षी में स्त्री के सतीत्व की परीक्षा लेते है। तब माताजी की पड सबके सम्मुख फैला दी जाती है और माताजी का धूप ध्यान करने पश्चात् पचायत के सम्मुख उस स्त्री विशेष को उफनती हुई तेल की कढ़ाई मे हाथ डालने को कहा जाता है।

सबके सामने माताजी की साक्षी में वह स्त्री तेल की कढाई में अपने हाथ डालती है। यदि उसके हाथो पर उकलते तैल का किसी प्रकार का कोई असर नहीं होता है तो वह स्त्री चरित्रवान तथा सचलनी समझ ली जाती है। अग्नि परीक्षा की ऐसी परम्परा अन्य जातियों में भी विद्यमान है। सासी जाति में एक नवोढे को सुहागरात के दिन हीअपनी नई नवेली के चरित्र पर सन्देह हो आया तब उसने सुहागरात मनाना छोड़ दिया और आसपास के गांवों के पचो की साक्षी मे सोलह वर्षीय दुल्हन लीलीवाई की अग्नि परीक्षा ली गई। सूर्योदय के समय लीली ने तब अग्नि परीक्षा दी। पहले उसे नहलाकर निर्वस्त्र कर दिया। केवल एक छोटा सा धुला हुआ सफेद लट्ठा औढने को दिया। फिर उसके दोनों हाथों पर पीपल के पत्ते रखकर कच्चे सूत से उन्हें बाध दिया। मुहूर्त के अनुसार तब पंचों द्वारा कोई ढाई किलो वजन का लाल गर्म लोहे का गोला उसके हाथ में रख दिया गया और कहा गया कि सात कदम चलकर पास पहे सरकडो पर वह गोला रख आये लीली ने ऐसा ही किया। वह बेदाग बच गई और चरित्रवान सिद्ध हो गई नव दुल्हे राजा को बतोर जुर्माना ढाईसौ रूपया देकर अपनी नवविवाहिता से माफी मागनी पडी। राजस्थान के अत्यन्त लोकप्रिय कांगमिया गीत में भी क्रांसिमा नाकर ले जाने वाली पणिहारिनो के लिये हथेली पर गर्म गोले रखकर चोरी का पता लगाने का उद्धालु मिलता है। गीत की पक्तिया है -

धमण धमाई लू, गोला तपाई लू, 

तातो तैल तपाई लू, रे

अणी कांगसिया रे कारणे म्हूं

 मंदर धीज धराइ लू रे

 पणिहार्यो ले ले गई रे

 म्हारे छैल भंवर रो कांगसियो

पणिहाऱ्या ले गई रे| 

बाबरी लोग माताजी की इस पड का एक उपयोग और करते हैं और वह चोरी करने के लिये जाने हेतु शुभ-अशुभ शकुन लेना कहते हैं कि पड़ जब अच्छे शकुन दे देती है तो ये लोग चोरी हेतु निकल पडते हैं और जब सफलतापूर्वक घर लौट आते हैं तो माताजी की इस पड को खूब धूपध्यान देते हैं। नवरात्रा में तो नौ ही दिन पड को धूपदीप किया जाता है। पड चितेरे श्रीलाल जोशी ने बताया कि चूंकि माताजी की पड़ का उपयोग अधिक नहीं होता है इसलिये ये पडें इक्की दुक्की ही बनवाई जाती है परन्तु बावरी लोग बड़ी श्रद्धा और भाक्ति से इस पड को बनवाकर वडे यत्नपूर्वक अपने घरों में रखते हैं।

उनकी तो यह पड़ की एकमात्र देवी, माताजी और रक्षिका है। अपना प्रत्येक महत्वपूर्ण कार्य सस्कार ये लोग इसी पड देवी की छत्रछाया मे सम्पन्न करते हैं! सतीत्व परीक्षा के हमारे यहां और भी कई रूप प्रचलित रहे हैं। सीता की अग्नि परीक्षा तो जग जाहिर है ही पर लोकजीवन भी ऐसी अग्नि परीक्षा से अछूता नहीं रहा है।

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