Religious
Religious books - aarti, bhajan, shlok, etc.
गिजरू का अमराक
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किसी समय अरब के एक गाँव में 'गिजरू' नामक एक आदमी रहता था। वह अपने कबीले का सरदार भी था। गिजरू को दुनिया में अगर जान से भी प्यारी कोई चीज़ थी तो यह उसका एक घोड़ा था। उस घोड़े का नाम था 'अमराक वह उस पर सो जान से न्योछावर था।

गिरनार का रहस्य
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किसी समय सौराष्ट्र में गिरनार के पास मोहन नाम का एक गरीब लड़का रहा करता था । वह जिस जगह रहता था वह पहाड़ों से भरी थी। लोगों का कहना था कि उन पहाड़ों में एक पर बड़ी अजीब अजीब चीजें नज़र आती हैं। इसलिए मोहन हर रोज़ उन पहाड़ों पर घूमने जाता था। उसे एक सुन्दर बाग दिखाई दिया। उसमें तरह तरह के पेड़ पौधे लगे हुए थे। तरह तरह के फूल खिल रहे थे और तरह तरह के पशु पक्षी स्वच्छन्द होकर विचर रहे थे। उस बगीचे के बीचोबीच गुलर का पेड़ था! और उसके निचे श्री दत्तात्रेय का स्थान था| यह सब देख कर मोहन का वहाँ से लौटने का मन न हुआ।

पारसमणी
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पुराने जमाने में पंढरपुर में एक भक्त ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी कमला भी बड़ी पतिव्रता थी। वे स्त्री-पुरुष दोनों रोज बड़ी भक्ति के साथ देवी रुक्मिणी की पूजा करते थे। देवी ने उनको पारस पत्थर दिया। उस पत्थर का प्रभाव ऐसा था कि जो चीज़ उससे छू जाती तुरन्त सोना बन नाती । अब उस ब्राह्मण को किस चीज की कमी हो सकती थी! उसके दिन आराम गुजरने लगे।

पटेल का फैसला
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हिंदी लघुकथा पटेल का फैसला

सापळा
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अघोरी तांत्रिक लोकांचे जग नेहमीच अगम्य राहिले आहे. त्यामुळेच त्यांच्यातील एक जण तुम्हाला कधी गर्तेत ओढून नेईल हे देखील सांगणे कठीण आहे. प्रामाणिक व्यक्ती ओळखणे आज अवघड झाले आहे. विश्वास ठेवण्याआधी १०० वेळा विचार करा. तो एखादा सापळा असू शकतो. सदर कथा हि संपूर्णपणे काल्पनिक आहे. हिचा वास्तवाशी काही एक संबंध नाही. केवळ मनोरंजन या हेतूनेच या कथेचे वाचन करावे. आम्ही कोणत्याही प्रकारच्या अंधश्रद्धेला खतपाणी घालत नाही. कथेतील ठिकाणे, पात्र, यांची नावे यात काही साधर्म्य आढळले तर तो निव्वळ योगायोग समजावा आणि एक मनोरंजक कलाकृती म्हणून या कथेचा रसास्वाद घ्यावा. लहान मुलांनी किंवा मृदू आणि हळव्या मनाच्या व्यक्तींनी हि कथा वाचणे योग्य ठरणार नाही.

ஏட்டில் இல்லாத மகாபாரதக் கதைகள்
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மகாபாரதக் கதைகளை ஏட்டில் படித்தவர்கள் பலர். ஆனால் அக்கதைகளை ஏட்டில் படிக்காதவர்களிடையே பல வேறுபட்ட கதைகள் வழக்கில் உள்ளன. அவை ஏட்டில் இடம்பெறாத நாட்டுப்புறக் கதைகள். செவிவழிக் கதைகளாக வழங்கப்பெறும் அக்கதைகள் மூலம் பல அறநெறிகள் கற்பிக்கப்படுகின்றன. மனிதர்களின் மனங்களைப் பக்குவப்படுத்துவதற்காகவே கதைகள் பிறந்தன. அவை ஏட்டு வடிவக் கதைகளாக இருந்தாலும் செவிவழிக் கதைகளாக இருந்தாலும் நன்மை பயப்பவைகளே தவிர தீமை விளைவிப்பன அல்ல.

गणेश स्थापना पूजा विधी

चतुर्थीला गणेश स्थापना करायची असेल तर इथे सर्व पूजा विधी उपलब्ध आहे.

सार्थ श्रीसत्यनारायण पूजा कथा

Satyanarayan is a very popular vrata and this vrat katha is always told during the katha. It is considered holy to listen to this story.

পাঁচশো বছর পুরনো অঘোরী
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গিরনারে পাঁচশো বছর পুরনো অঘোরী পাওয়া গেছে, এমনি তো আমাদের এখানে অনেক গিরি রয়েছে তবে মূলটি দুটি মাত্র। প্রথম হিমগীর এবং দ্বিতীয় গিরনার। একটি পাহাড়ের রূপ, তবে দ্বিতীয় জমির রূপ নয়…! পুরুষ ও স্ত্রীর এই রূপ নদী নালা ভীম হ'ল দুর্দান্ত গরুর তীব্র তপস্যা করার জায়গা। এমন কোনো গুহা খুঁজে পাওয়া যাবে না যেখানে মমির মতো দেখতে সাধু তপস্যা করে নি।

வானர கீதை
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பராசர சம்ஹிதையிலிருந்து அனுமனின் துதி :

संताच्या जीवनातील प्रेरक प्रसंग -भाग पहिला
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जीवनाचा मार्ग सुकर करणाऱ्या प्रेरक लघुकथा

சிவபெருமான் ஏன் விநாயகரின் தலையை யானைக்கு மாற்றினார்?
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விநாயகரின் தலை எவ்வாறு யானைக்கு மாற்றப்பட்டது என்பதை இதில் காண்போம்.

ஹனுமன் ஜெயந்தி
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ஹனுமன் ஜெயந்தி ஏன் ஒவ்வொரு வருடமும் இரண்டு முறை கொண்டாடப்படுகிறது என்பதைப் பற்றி இங்கு காண்போம்.

চিত্রাঙ্গদা
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চিত্রাঙ্গদা মহাভারতের একটি চরিত্র। কে ছিলেন এই চিত্রাঙ্গদা ?? মহাভারতের কোন চরিত্রের সাথে তিনি সম্পর্কিত? তার জীবনী কী? চিত্রাঙ্গদার নামটি আপনি কোথায় শুনেছেন, এ নিয়ে একটু বিচার করুন …!

एकलिंगजी

सबसे बड़ी धजा वाले मन्दिरों पर धजा चढाने का भी पूरा संस्कार है। यदि इन धजाओं का ही अध्ययन किया जाय तो ऐसी बहुत सी सामग्री हाथ लग सकती है जो धजा परम्परा और उनके जुड़े देवता का रोचक इतिहास ही प्रस्तुत कर दे। धजाओं के विविध रंग, उनके आकार- प्रकार उनकी साज-सज्जा, उन पर लगे धगे विविध कलात्मक चित्र प्रतीक बड़ा रोचक दास्तान देते है।

दिव्यात्माओं का एक मेला
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सन् १९८२ में दीवाली की घनी अधेरी डरावनी रात में लोकदेवता कल्लाजी ने अपने सेवक सरजुदासजी के शरीर में अवतरित हो मुझे चित्तौड़ के किले पर लगने वाला भूतों का मेला दिखाया तब मैंने अपने को अहोभाग्यशाली माना कि मै पहला जीवधारी था, जिसने उस अलौकिक, अद्भुत एवं अकल्पनीय मेले को अपनी आँखों से देखा।

भारत के जनप्रिय सम्राट

शासन एक लिप्सा भी है और शासन ईश्वरीय इच्छा से अन्याय, शोषण, कुपोषण, अधर्म और बुराइयों को वैयक्तिक और राष्ट्रीय जीवन से उपेक्षित करने तथा न्याय, विधि, व्यवस्था धर्म के चराचर मूल्यों की सुदृढ़ स्थापना के उद्देश्यों की प्राप्ति का एक पवित्र साधन भी है। शासन, जब निरपेक्ष, तटस्थ ईश्वरीय प्रेरणा की अनुभूति में स्वीकार किया जाता है, तब यह एक आत्मीय भजन बनकर समय के आन्दोलनों को सुसंस्कृत करता है। 'भारत के जनप्रिय सम्राट' में पुरूरवा से छत्रसाल तक के जनप्रिय राजाओं के कार्यक्रमों को एक सूक्ष्म दृष्टि से देखा गया है। सारे सम्राटों का आकलन करने से पता चल ही जाता है-ये जनप्रिय क्यों रहे? ये अप्रिय क्यों नहीं हुए? साहित्य, कला, संस्कृति, धर्म, सेवा, उद्योग-कला-कौशल, धर्म, सेवा, शौर्य के गुणों का संगठन जिस सम्राट ने जीवन में किया, वह जनप्रिय हुआ और जिसने शासन को अपनी कुप्रवृत्तियों, अहं और वासना की पूर्ति का संसाधन बनाया, वह विनष्ट हो गया। दूसरे शब्दों में आत्मशक्ति से जिस राजा ने इन्द्रियों पर शासन किया, वह जनप्रिय बना और जिस राजा ने इन्द्रियों को स्वच्छाचारी बनाया, वह अप्रिय हो गया। सम्राट होना और जनप्रिय होना- एक साथ संभव नहीं होता। अनुशासन राजस्व और प्राशासन के विन्दुओं पर सम्राट कैसे जनप्रिय रह सकता है? पर, ऐसे सम्राट हुए हैं, जो जनप्रिय रहे हैं। 'सम्राट' पद साधना की एक सफलता है। सम्राट साम्राज्य में जनहित का साधन है। सम्राट के इन्हीं विन्दुओं को सामने रखकर 'भारत के जनप्रिय सम्राट' की इस लघु खोज में पुरूरवा से छत्रसाल-वेदों से चलकर हाल की सदी तक के सम्राटों के जनप्रिय प्रतिनिधि राजाओं के जीवन-दर्शन का स्पर्श मैंने किया है। लक्ष्य है अपने जीवन के रेखाचित्र को भारत के जनप्रिय सम्राटों के लोकप्रियता के रंगों से रंगकर जनप्रिय आज के लोकतंत्र में कोई भी हो सकता है। कौन है, जो जनप्रियता का रंग नहीं चाहता? जनप्रिय होना है तो 'भारत के जनप्रिय सम्राटों' की जनप्रियता के रंगों को समझना होगा। इसी से जनप्रियता की वर्तमान चुनौतियों को सामने रखकर 'भारत के जनप्रिय सम्राट' प्रस्तुत कर रहा हूँ।

शोनार बाँग्ला

बंगाल…! इस्ट इंडिया कंपनीला सहज पाय रोवता आले असा हा प्रदेश…! भारतातले सर्वात मोठे शहर म्हणजे बंगालची राजधानी कोलकत्ता. स्वातंत्र्यपूर्व काळात “फोडा आणि राज्य करा” या ब्रिटीश राजनीतीला बळी पडलेला प्रदेश म्हणजे बंगालच. रवींद्रनाथ टागोर , राजा राम मोहन रॉय, सुभाषचंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद यासारखे महान समाजसुधारक आणि क्रांतिकारक बंगालचेच..! असे असूनही, बंगालच्या लोकशाहीत कम्युनिस्ट आणि स्वतःला डाव्या विचारसरणीचे म्हणवून घेणाऱ्या माओवादी आणि नक्षली विचारसरणीच्या लोकांमुळे नेहमी रक्तरंजित निवडणुका आपण पहिल्या किंवा ऐकल्या, अनुभवल्या आहेत. २०२१ ची करोनाच्या सावटाखालची निवडणूक देखील याला अपवाद ठरली नाही. फासिवादाचा बुरखा पांघरलेली नेतृत्व हि खरोखर लोकशाही पध्दतीने निवडून आली आहेत कि, आणखी कोणत्या मार्गाने…? बंगालबद्दल राजकीय, सामाजिक, भौगोलिकदृष्ट्या नेहमीच भारताला आणि इतर जगाला एक वेगळे आकर्षण राहिले आहे. यासगळ्याची एक झलक या पुस्तकात आहे.

யுதிஷ்டிரரின் சொல்லப்படாத கதைகள்
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யுதிஷ்டிரரின் குணங்கள் மற்றும் வீரத்தை பற்றி நாம் அறியாத கதை.

वास्तूशास्त्र

वास्तूशास्त्र ह्या विषयावर अनेक गैरसमज पसरवले जातात. ह्या पुस्तकांत आपण खरी माहिती जाणून घ्या.

मंत्रसाधना : इच्छापूर्ति

मंत्रो में शक्ति होती है यह एक प्राचीन हिन्दू धारणा है। कुछ सिद्ध मन्त्र हम यहाँ आपके लिए प्रस्तुत कर रहे है।

संंत तुकाराम

संत तुकाराम (ऊर्फ तुकोबा) हे इ.स.च्या सतराव्या शतकातील एक वारकरी संत होते. त्यांचा जन्म वसंत पंचमीला-माघ शुद्ध पंचमीला झाला. पंढरपूरचा विठ्ठल वा विठोबा हे तुकारामांचे आराध्यदैवत होते. तुकारामांना वारकरी 'जगद्‌गुरु ' म्हणून ओळखतात. वारकरी संप्रदायातल्या प्रवचन व कीर्तनाच्या शेवटी - ' पुंडलीक वरदे हरी विठ्ठल, श्री ज्ञानदेव तुकाराम, पंढरीनाथ महाराज की जय, जगद्गुरु तुकाराम महाराज की जय' असा जयघोष करतात.जगद्गुरु तुकाराम लोककवी होते. जे का रंजले गांजले! त्यासी म्हणे जो आपुले तोचि साधू ओळखावा! देव तेथेची जाणावा! अशा प्रकारचे अभंग संत तुकाराम महाराजांनी जनसामान्यांना सांगून ईश्वर भक्तीचा सुगम असा मार्ग दाखवला. वारकरी संप्रदायाची एक अखंड परंपरा त्यांनी निर्माण केली. सतराव्या शतकामध्ये सामाजिक प्रबोधनाचे मुहूर्तमेढ रोवणारे सुधारक संत म्हणून तुकाराम महाराजांचा उल्लेख करावा लागेल. तुकाराम महाराज वास्तववादी निर्भीड आणि वेळप्रसंगी समाजातील दांभिकपणावर रोखठोक शब्दांमध्ये प्रहार करणारे संत होते. महाराष्ट्राच्या भूमीमध्ये या काळात अनागोंदी निर्माण झालेली होती. अशा काळामध्ये संत तुकारामांनी समाजाला अचूक मार्गदर्शन करण्याचे काम आपल्या साहित्यातून व कीर्तनांतून केले.

जीवनकलेची साधना

लेखक:- मोक्षनिवासी प.पु.सदगुरु श्री गणपत नानाजी हंबीर (हंबीरबाबा) विश्वव्यापी मानवधर्म आश्रम

कोजागरी पौर्णिमा

कोजागरी पौर्णिमा किंवा शरद पौर्णिमा, ही आश्विन पौर्णिमेला एक हिंदू सण म्हणून साजरी करतात. ही शरद ऋतूतील आश्विन महिन्यात येते. इंग्रजी कॅलेंडरप्रमाणे कोजागरी पौर्णिमा बहुधा सप्टेंबर ते ऑक्टोबरमध्ये असते. कृषी संस्कृतीत ह्या दिवसाला विशेष महत्त्व आहे. या पौर्णिमेला माणिकेथारी (मोती तयार करणारी) असेही संबोधिले जाते.

नवदुर्गा

नवदुर्गा हिन्दू धर्म में माता दुर्गा अथवा पार्वती के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नवों दुर्गा को पापों के विनाशिनी कहा जाता है, हर देवी के अलग अलग वाहन हैं, अस्त्र शस्त्र हैं परंतु यह सब एक हैं।

दशहरा

दशहरा (विजयादशमी या आयुध-पूजा) हिन्दुओं का एक प्रमुख त्योहार है। अश्विन (क्वार) मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। भगवान राम ने इसी दिन रावण का वध किया था तथा देवी दुर्गा ने नौ रात्रि एवं दस दिन के युद्ध के उपरान्त महिषासुर पर विजय प्राप्त किया था। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसीलिये इस दशमी को 'विजयादशमी' के नाम से जाना जाता है (दशहरा = दशहोरा = दसवीं तिथि)। दशहरा वर्ष की तीन अत्यन्त शुभ तिथियों में से एक है, अन्य दो हैं चैत्र शुक्ल की एवं कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा।

नवरात्रोत्सव

नवरात्र मराठी माहिती

दुर्गापूजा

दुर्गापूजा हा बंगालमधील एक हिंदू सण आहे. या दिवशी दुर्गा देवीची पूजा केली जाते. हा नवरात्राशी संबंधित सण आहे. या व्रताचे विकल्प कालिका पुराणात सांगितले आहेत.

दुर्गा देवी

दुर्गा ही एक हिंदू धर्मातील शस्त्रधारी देवी आहे. या दुर्गेची नऊ रूपे आहेत.

विठ्ठल

विठ्ठल हे वारकरी संप्रदायाचे प्रमुख दैवत मानले जाते. विठोबा, विठू, पांडुरंग,विठूराया वा पंढरीनाथ ही हिंदू देवता मुख्यतः भारताच्या महाराष्ट्र व कर्नाटक ह्या राज्यात पूजिली जाते.