महासीलव जातक की गाथा – [पुरुष को आशा लगाए रखना चाहिए। विद्वान निराश न हो। मैं स्वयम् को ही देखता हूँ। जैसी इच्छा की थी, उसी के अनुसार सब कुछ हुआ।]

वर्तमान कथा – हारिए न हिम्मत
एक बार एक निराश भिक्षु से भगवान बुद्ध ने प्रश्न किया, “क्यों भिक्षु! क्या तू सचमुच ही हिम्मत हार बैठा है?” भिक्षु बोला, “हाँ भगवन्”!

बुद्ध ने कहा, “कल्याणकारी शासन में प्रव्रजित होकर हिम्मत नहीं हारना चाहिए। पूर्व काल में बुद्धिमानों ने राज्य खोकर हिम्मत बनाए रखी थी और अपने नष्ट हुए यश को फिर से प्राप्त किया था।”

भिक्षुओं के जिज्ञासा करने पर भगवान ने पूर्व काल की आशावान राजा की कहानी इस प्रकार सुनाई।

अतीत कथा – आशावान राजा महासीलव की कथा
एक बार बोधिसत्व का जन्म काशिराज की पटरानी की कोख से हुआ। उनका नाम पण्डितों ने सीलव रखा। पिता के स्वर्ग सिधारने पर सीलव महासीलव के नाम से काशी के सिंहासन पर आसीन हुआ। महासीलव बड़ा धार्मिक राजा था। उसके राज्य में प्रजा अत्यंत सुखी थी। कोई कभी भूखा नहीं रहता था। लोग पाप से घृणा करते और सदाचरण रत थे।

एक बार एक मन्त्री को उसका आचरण सदाचार से गिरा होने के कारण राजा ने राज्य से निकाल दिया। वह मन्त्री काशी से चलकर कोशल राज्य में पहँचा और थोड़े दिनों में ही वहाँ के राजा का विश्वासपात्र बन गया।

एक दिन नए मन्त्री ने कोशलराज से कहा, “महाराज! काशी का राज्य एक मधु-पूर्ण छत्ते के समान है। इस समय बिना विशेष प्रयास के ही उसपर अधिकार किया जा सकता है।”

राजा ने पहले तो इस झमेले में न पड़ने का ही निश्चय किया, परन्तु मन्त्री ने जब यह कहा कि “राज्य पर अधिकार बिना युद्ध ही के हो जायगा”, तो वह एक बड़े राज्य के पाने का लोभ न रोक सका। धीरे-धीरे कोशल के लोगों ने काशी की सीमा में प्रवेश कर लूटपाट आरम्भ कर दी।

महासीलव ने उन्हें बुलाकर पूछा, “तुम किसलिये यह अनाचार करते हो?” उन्होंने उत्तर दिया, “धन पाने के लिये।” राजा ने उन्हें धन देकर संतुष्ट कर दिया। कोशलराज को विश्वास हो गया कि काशी का राजा युद्ध नहीं करना चाहता। उसने सेना लेकर काशी पर आक्रमण कर दिया।

काशिराज महासीलव के योद्धाओं ने युद्ध करने की अनुमति मांगी, परंतु राजा ने मना कर दिया। कोशलराज ने बिना विरोध ही राजभवन में प्रवेश किया। “राज्य के लिये मैं मनुष्यों का रक्त बहाना उचित नहीं समझता”, ऐसा कहकर महासीलव ने सिंहासन खाली कर दिया।

नीच मन्त्री ने कोशलराज के कान में कहा, “महाराज भी कहीं ऐसी ही उदारता दिखाने की भूल न कर बैठें।” कोशलराज के आदेश से महासीलव तथा उसके मन्त्री और योद्धागण जीवित ही श्मशान में गाड़ दिये गए। केवल उनका सिर भर बाहर निकला छोड़ दिया गया।

रात्रि में श्मशान में सियारों के दल आए। उनके पास आने पर सब योद्धा चिल्ला उठे, जिससे सियार डर कर भाग गये। थोडी देर में सियार फिर लौटे। महासीलव ने एक तगड़े सियार को अपनी ठुड्ढी के नीचे दाब लिया। सियार ने छूटने के लिये भरपूर जोर लगाया, पर न छूट सका। इस खींचतान में गड्ढे की मिट्टी ढीली पड़ गई और महाराज महासीलव प्रयत्न करके उससे बाहर निकल पाए। उन्होंने सियार को छोड़ दिया, जो अपने साथियों सहित वन में भाग गया। इसके पश्चात् उन्होंने अपने सब साथियों को भी गड्ढों से बाहर निकाल लिया।

इसी समय श्मशान में कुछ लोग एक शव छोड़ गए, जिसके बँटवारे के लिये दो यक्षों में झगड़ा प्रारम्भ हो गया। बोधिसत्व ने यक्षों से कहा, “यदि तुम हमारा कुछ काम करो, तो मैं इस शव को काटकर ठीक दो भाग कर दूंगा।” यक्ष राजी हो गए।

राजा ने खड्ग से काटकर शव के ठीक दो भाग कर दिये, जिससे यक्षों को संतोष हुआ। मांस खा चुकने पर यक्षों ने राजा से पूछा, “हमें आप क्या करने का आदेश देते हैं?”

राजा महासीलव ने यक्षों से कहा, “मुझे अत्यन्त गुप्त रूप से राजभवन में पहुँचा दो और इन सब योद्धाओं को इनके घर।”

यक्षों ने राजा के आदेश का पालन तत्काल कर दिया।

कोशल का राजा आराम से सो रहा था। महासीलव ने तलवार की नोंक उसके पेट में चुभो कर उसे जगाया। महासीलव को सामने देखकर वह एकदम घबड़ा गया। उसने सोचा, इस धर्मात्मा राजा में अवश्य ही कुछ अलौकिक शक्ति है, तभी तो यह सेना और पहरेदारों से घिरे हुए प्रासाद में अकेला निर्विघ्न चला आया।

उसने बोधिसत्व के चरणों पर गिरकर क्षमा मांगी। दूसरे दिन सबेरे सब लोगों को बुलाकर उसने उस चुगुलखोर मन्त्री को दंड दिया और अपनी सेना सहित काशी छोड़कर कोशल की ओर प्रस्थान कर गया।

आशावान राजा की कहानी का मर्म भिक्षुओं को समझाते हुए भगवान बुद्ध ने उपरोक्त गाथा कही कि पुरुष को आशा लगाए रखना चाहिए। विद्वान निराश न हो। मैं स्वयम् को ही देखता हूँ। जैसी इच्छा की थी, उसी के अनुसार सब कुछ हुआ।

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