कक्कट जातक की गाथा – [सुनहले चंगुलों वाला जीव, जिसकी आँख पैनी है, जो कीचड़ में पला है, जिसकी खोपड़ी गंजी है और हड्डियों के आवरण से आवृत्त है, उसी ने मुझे पकड़ लिया है! मेरी करुण पुकार सुनो! मेरी सहचरी! मेरा साथ मत छोड़ो–क्योंकि तुम मुझसे स्नेह करती हो।”]

वर्तमान कथा – पति की प्राण-रक्षा
कहा जाता है कि एक बार श्रावस्ती का एक धनी पुरुष अपनी पत्नी सहित ऋण वसूल करने के लिये गाँवों में गया था, जहाँ उसे डाकुओं ने घेर लिया। उस धनी पुरुष की पत्नी परम रूपवती थी, अतः डाकुओं के सरदार ने सोचा कि वह उसके पति को मारकर उस पर अधिकार कर सकता है। परन्तु वह स्त्री मानी और पतिव्रता थी। उसने डाकू सरदार के पैरों पर गिरकर कहा, “मेरे पति के प्राणों की रक्षा कीजिए। यदि आपने उसके प्राण ले लिये तो मैं भी विष खाकर अपने प्राण दे दूंगी।”

इस प्रकार डाकुओं से पति को छुड़ाकर वह उसे लेकर श्रावस्ती लौट गई। जेतवन के पास पहुंचने पर उन दोनों की इच्छा हुई कि विहार में चलकर भगवान बुद्ध के भी दर्शनों का लाभ ले लें। भगवान ने पूछा, “किधर गये थे?”

धनी पुरुष ने कहा, “ऋण वसूल करने।”

“क्या सब काम ठीक-ठीक हो गया?”, भगवान ने फिर प्रश्न किया।

धनी पुरुष ने उत्तर दिया, “भगवन्! हमें डाकुओं ने पकड़ लिया था और मेरी हत्या करना चाहते थे। परन्तु मेरी इस पत्नी ने प्रार्थना करके मुझे मुक्त करा दिया।”

भगवान बोले, “उसने तुम्हारी ही प्राण रक्षा नहीं की है। पिछले जन्म में इसने अन्य प्राणियों की भी प्राण रक्षा की थी।” सेठ के जिज्ञासा प्रगट करने पर भगवान ने नीचे लिखी सोने के चंगुल वाले कर्कट की कथा सुनाई–

अतीत कथा – कर्कट के सोने के चंगुल
किसी समय में जब काशी में महाराज ब्रह्मदत्त राज्य करते थे, हिमालय पर्वत पर एक विशाल सरोवर था। इस सरोवर में एक बहुत बड़ा केंकड़ा (कर्कट) रहता था। वह इतना बड़ा था कि अपने विशाल चंगुल से वह बड़े-बड़े हाथियों को भी पकड़कर मार डालता था।

इसी कर्कट के कारण उस सरोवर का नाम भी कर्कट-सरोवर पड़ गया था। इस महा कर्कट का शरीर सोने के भाँति चमकता था, इसीलिए लोग उसे स्वर्ण-कर्कट भी कहते थे। उसके भय के मारे हाथियों ने उस सरोवर पर जाना ही छोड़ दिया था।

इसी समय बोधिसत्व हाथियों के सरदार की पत्नी के गर्भ से प्रगट हुए। इस गज-कुमार का शरीर विशाल था और उसमें बुद्धि भी थी। धीर-धीरे वह बड़ा हुआ और एक गज-कन्या से उसकी जोड़ी भी मिल गई।

तरुण गज-कुमार ने अपने गिरोह के सब हाथियों को एकत्र किया और उस स्वर्ण-कर्कट रूपी कंटक को सदा के लिये नष्ट करने का संकल्प किया। माता-पिता ने मना किया, परन्तु हठी तरुण न माना और अपने साथियों और पत्नी के साथ उस सरोवर की ओर चल पड़ा। सरोवर के पास पहुंच युवा गजेन्द्र ने पूछा, “क्यों भाइयो! कर्कट तुम पर आक्रमण करता है–तालाब में उतरते समय अथवा नहाकर लौटते समय?”

साथियों ने बताया कि कर्कट लौटते समय ही आक्रमण करता है। तरुण गजराज ने अपने साथियों से कहा, “भाइयो! आप सब लोग पहले सरोवर में प्रवेश करके स्नान कर आवें और जो कुछ खाने योग्य वहाँ हो उसका आहार करके वापिस लौट आवें। मैं सबके अंत में सरोवर में प्रवेश करूंगा।”

जब बोधिसत्व ने सबके लौट आने पर सरोवर में प्रवेश किया, तो उस धूर्त कर्कट ने अपने विशाल चंगुल से उनको इस तरह कस लिया जैसे सुनार अपनी सँडसी से किसी छोटे-से स्वर्ण-खंड को पकड़ता है।

गजराज ने भरपूर जोर लगाया परन्तु वह केंकड़ा अपने स्थान से तनिक भी न डिगा, न उसकी पकड़ ही लेशमात्र ढीली पड़ी। धीरे-धीरे कर्कट ने अपने चंगुल को कसना और गजराज को अपनी ओर खींचना प्रारम्भ किया।

अपनी विवशता के कारण गजराज बड़ी जोर से चिंघाड़ उठा। उस भयपूर्ण शब्द को सुनकर हाथियों का समूह डरकर भागने लगा। गजराज की पत्नी भी विचलित होकर पति की ओर देखने लगी। उस समय गजराज ने सरोवर के बीच में से पुकारकर यह गाथा कही–

“सुनहले चंगुलों वाला जीव, जिसकी आँखें पैनी है जो कीचड़ में पला है, जिसकी खोपड़ी गंजी है और जो हड्डियों के आवरण से आवृत्त है, उसी ने मुझे पकड़ लिया है। मेरी करुण पुकार सुनो! मेरी सहचरी! मेरा साथ मत छोड़ो–क्योंकि तुम मुझसे स्नेह करती हो।”

गज-पत्नी ने स्वामी के दुःख और करुणापूर्ण शब्द सुने। उसने पीछे मुड़कर कहा–

“आप को छोड़ दूँ। कभी नहीं। प्रिय पति! आप की आयु के तीन पन पूरे हो जाने पर भी मैं आपको छोड़ नहीं सकूंगी। चारों दिशाओं में इस पृथ्वी पर कहीं भी मेरे लिए कोई इतना प्रिय नहीं है जितने तुम हो।”

इस प्रकार पति को धीरज बंधाकर उसने उस स्वर्ण कर्कट को सम्बोधन करते हुए कहा–

“मैं जानती हैं कि समुद्र में, गंगा और नर्मदा में जितने भी कर्कट हैं, आप उन सब में श्रेष्ठ हैं और सब के राजा हैं। मेरी प्रार्थना पर ध्यान दीजिए और मेरे पति को छोड़ दीजिए।”

नारी का कण्ठ स्वर सुनकर केकड़े का हृदय पसीज गया। उसने अपने चंगुल ढीले कर दिए। पैर छूटते ही गजराज को अवसर मिला। उसने पूरे जोर से केकड़े की पीठ पर आघात किया और उसकी आँखें बाहर निकल पड़ीं।

गजराज ने हर्ष ध्वनि की। उसके साथी फिर सरोवर पर लौट आए और उस केकड़े को अपने चरणों से कुचलकर पीस डाला। परंतु केकड़े के वे सोने के चंगुल नहीं टूटे। वे सरोवर के जल के साथ बहकर गंगा में और पीछे समुद्र में जा गिरे। वहाँ से दो राजकुमारों ने उन्हें प्राप्त किया। इन राजकुमारों को परास्त कर इन्द्र ने उन पर अधिकार कर लिया। आकाश में वर्षा के दिनों में जब बिजली चमकती है, उस समय जो भयंकर शब्द सुनाई देता है वह इसी सोने के चंगुल का शब्द है। इन्द्र ने उसका नाम वज्र रख दिया है।

Listen to auto generated audio of this chapter
Please join our telegram group for more such stories and updates.telegram channel

Books related to जातक कथाएँ