इन्द्र और वृत्रासुर का युद्ध वैदिक युगीन इतिहास का एक ओजस्वी अनावरण है। वर्तमान मन्वन्तर (आधुनिक विज्ञान में प्रकाशवर्ष की तरह का दिव्यवर्ष में भारतीय कालमान की पहली चतुर्युगी के त्रेतायुग के आरम्भ में वृत्रासुर और इन्द्र के बीच देवलोक के राज्य सिंहासन को लेकर युद्ध हुआ। एक बार देवसभा में नृत्यगान-वाद्य का रंगारंग कार्यक्रम चल रहा था। तभी देवगुरु वृहस्पति के पधारने पर दपीले देवराज न उठे, न गुरु को आसन ही दिया। इससे देवगुरु वृहस्पति सभा का त्याग कर बाहर आ गये और देवलोक छोड़कर कहीं अन्तर्ध्यान (भूमिगत) हो गये। इन्द्र को भूल का ज्ञान हो गया। उधर शुक्राचार्य ने देखा-वृहस्पति और इन्द्र में ठन गयी है। अवसर का लाभ उठाकर दैत्यों को प्रेरित कर देवलोक पर उन्होंने प्रभुत्व अपना कस दिया। इन्द्र सहित देवता ब्रह्मा की शरण लिये।

ब्रह्मा ने कहा-'गुरु-तिरस्कार' का यह कुफल है। लगता है शुक्राचार्य के नेतृत्व में मेरा ब्रह्मलोक भी छीन लिया जायेगा। एक ही रास्ता है त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप की शरण लो। वे तपस्वी, ब्राह्मण और संयमी हैं। विश्वरूप के ऋषि-आश्रम में देवता गये और बोले-'हम एक तरह से तुम्हारे पिता हैं। हमारी समस्या का निराकरण करें।' विश्वरूप ने वैष्णवी विद्या के प्रभाव से असुरों की संपदा छीनकर इन्द्र को दिला दिया और नारायण कवच को धारण करने का उपदेश देकर नारायण कवच के रहस्यों को समझा दिया। विश्वरूप के तीन सिर थे। एक मुँह से सोमरस पीते, दूसरे से सुरापान करते, तीसरे से अन्न ग्रहण करते थे। इनके पिता त्वष्टा बारह आदित्य देवता थे। विश्वरूप की मां असुरकुल की थीं। अतः मातृप्रेम में ये छिपकर असुरों के भाग के लिए आहुति देवताओं के भाग के आहुति के साथ दे दिया करते थे। त्वष्टा का यह साम्यवाद इन्द्र को आपत्तिजनक था। इन्द्र ने विश्वरूप के तीनों सिर काट डाले। विश्वरूप का सोमपायी सिर पपीहा, सुरापायी सिर गौरया, और अन्नाहारी सिर तीतर हो गया। इन्द्र पर ब्रह्महत्या लगी। इस ब्रह्महत्या को चार भाग में कर इन्द्र ने प्रत्येक चतुर्थांश को पृथ्वी, जल, वृक्ष और स्त्रियों में बाँट दिया। विश्वरूप के वध हो जाने पर, इनके पिता त्वष्टा ने 'इन्द्रशत्रोर्विवर्धस्व' मंत्र से यज्ञ का आयोजन इन्द्र के शत्रुओं की बाढ़ की मानसिकता से किया, पर, ऋत्विजों ने उच्चारण के भेद से अर्थ बदल दिया, जिसका आशय था- 'इन्द्र! शत्रुओं पर तुम्हारी वृद्धि हो।'

यज्ञ की सम्पन्नता पर वृत्रासुर प्रकट हुआ। प्रचण्ड प्रतापी वृत्रासुर हुआ। वृत्रासुर ने देवलोक पर आधिपत्य कर लि देवताओं सहित दन्द भगवान विष्ण की शरण लिए। भगवान ने रास्ता सझ१० प्रचण्ड प्रतापी वृत्रासुर हुआ। वृत्रासुर ने देवलोक पर आधिपत्य कर लिया। देवताओं सहित इन्द्र भगवान विष्णु की शरण लिए। भगवान ने रास्ता सुझाया- 'दधीचि से मिलो।' अथर्ववेदी दधीचि ने सर्वप्रथम नारायण कवच का त्वष्टा को उपदेश दिया। त्वष्टा से विश्वरूप को, विश्वरूप से तुम्हें मिला। दधीचि की हड्डियाँ प्रचण्ड और अभिमंत्रित हैं। तुम्हारे मांगने पर या अश्विनीकुमारों के मांगने पर वे नकारेंगे नहीं। उन हड्डियों से आयुध बनाकर मेरी ईश्वरीय शक्ति से उसे संयोजित कर उससे वृत्रासुर का सर काट लो। इसके बाद तुम्हारे पुराने दिन पुनः लौट आयेंगे।

दधीचि ने हड्डियाँ सौंप दीं। दधीचि की हड्डियों से आयुध तैयार हुआ। इन्द्र और वृत्रासुर में भयानक युद्ध हुआ। वृत्रासुर के आघात से ऐरावत चिंघाड़ कर अट्ठाइस हाथ पीछे हट गया। इन्द्र मूर्च्छित हो गये। वृत्रासुर ने इन्द्र को वीरता धर्म में छोड़ दिया। इन्द्र चेतना लौटने पर पुन: भीषण युद्ध करने लगे। वृत्रासुर को अकेला छोड़ सारे असुर भाग खड़े हुए। वृत्रासुर अकेला डटा सबसे जूझता रहा। देवसेना को अकेले ही बलात रोक दिया वृत्रासुर ने। वृत्रासुर की भयानक गर्जना से देवता मूर्च्छित हो गये। वृत्रासुर ने इन्द्र को ललकारा-'विश्वरूप का शीश धोखे से काटने वाले इन्द्र! तेरा शौर्य कहाँ गया? वज्र क्यों नहीं चलाता? शीश ही उतारो न? जीना-मरना युद्ध में तो होता ही रहता है।' इन्द्र ने अपने वज्र से वृत्रासुर की भुजायें काट डालीं। वृत्रासुर ने ऐसा प्रहार किया कि इन्द्र के हाथ से वज्र गिर गया। यह वज्र वृत्रासुर के पास जा गिरा। इन्द्र उठाने को लज्जावश उत्सुक नहीं हो पा रहे थे। वृत्रासुर ने कहा-'उठा लो वज्र और शत्रु को मारो। दु:खी क्यों होते हो इन्द्र!' इन्द्र ने कहा-'दानवश्रेष्ठ वीर! वस्तुतः तुम महान और सिद्ध पुरुष हो। तुम दैत्य नहीं, भगवद्भाव में एकनिष्ठ हो। तुमसे युद्ध कर मैं गौरवान्वित हुआ हूँ।' ऐसे वार्तालापों के बीच दोनों में युद्ध होता रहा। इन्द्र ने अपने योगबल और 'नारायण कवच से स्वयं को सुरक्षित कर रखा था। वृत्रासुर का वध का योग उपस्थित होते ही इन्द्र ने वृत्रासुर का सिर काट डाला।

वृत्रासुर ने मरने से पहले उद्घोष किया-'दधीचि की पावन हड्डियों के इस शस्त्र में भगवान की कृपा धारा का अजस्र प्रवाह है, जिसका स्पर्श पाकर मैं कृतार्थ हूँ।' लगता था जैसे वृत्रासुर स्वयं अपना असुर देह मिटाने पर तुला था। वृत्रासुर ने प्राणोत्सर्ग किये।

(फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी के लेख)

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