छत्रसाल का जन्म पहाड़ी गाँव में सन् १६४२ को हुआ था, जब इनके पिता इनकी माँ को लेकर मुगलों की सेना के घेरे से बचते हुए भागे-भागे रहते थे। इनके पिता चम्पतराय थे, जो जीवनभर संघर्षरत रहे। इनकी मां भी रणक्षेत्र में जाती थीं। जब ये गर्भ में थे, तब भी इनकी मां पति के साथ रणक्षेत्र में रहती थीं। तलवारों की खनखनाहट, गोलियों, तोपों के बीच मारकाट और लहूलुहानयुद्ध क्षेत्र का पहाड़ी एवं जंगली इलाका इनकी मां का प्रसूति गृह बना, जिसमें एक ओर शत्रु तो दूसरी ओर प्राकृतिक सौन्दर्य। ये नेपोलियन बोनापार्ट से भी बढ़कर थे, क्योंकि नेपोलियन वाटरलू में हारा, पर, छत्रसाल जीवनभर अविजित रहे। नेपोलियन से अधिक दक्ष, सैनिक संख्या कम, पर मुगलों को जीवनभर हराते-छकाते रहे रणकौशल से।

साहित्यानुरागी, प्रजावत्सल, धर्मप्राण, दीर्घजीवी शून्य से शिखर के महापुरुष थे ये, जिनके रोम-रोम में स्वातंत्र्य प्रेम भरा था। सर्वधर्म सम भाव के आचरणनिष्ठ व्यक्तित्व थे छत्रसाल। एक बार इनके माता-पिता कुछ सैनिकों के साथ भोजन पर थे जंगल में कि मुगलों ने जंगल घेर लिया। सारे सैनिक राजा रानी को सुरक्षा घेरे में लेकर भागे और छत्रसाल हड़बड़ी में छूट गये। मुगल सैनिक आये, परोसा गया भोजन किये, किसी को न पाकर चले गये, पर छत्रसाल को नहीं देख सके। धरती पर ये पड़े थे कि इन्हें ढूँढ़ते इनके सैनिकों ने इन्हें पाया और सुरक्षित ले आये। इसके बाद सुरक्षा के कारणों से ये ननिहाल अपनी मां के साथ पहुँचा दिये गये। शैशव में ये असली तलवार, धनुष बाण का खेल खेलते, असली बन्दूकों और तोपों की आवाज पर विभोर हो जाते। हाथी, घोड़े, तोप, बन्दूक और लड़ते अश्वारोही, सैनिकों का चित्र बनाना इनकी रुचि का विषय होता था। रामायण-महाभारत की कहानियाँ सुनते समय तन्मय हो जाते थे छत्रसाल।

दश वर्ष की आयु में ये एक ४० दक्ष सैनिक हो गये। शस्त्र संचालन में ये प्रवीण हो गये थे। केशव की रामचन्द्रिका इन्हें बहुत ही आकर्षित रखती थी। ये जब सोलह वर्ष के थे जब इनके माता- पिता की मृत्यु हुई, एक सैनिक से इनको यह हृदयविदारक सूचना मिली। जागीर जा चुकी थी। न सेना, न धन. ये अपने काका से मिले और एक राज्य खड़ा करने की महत्वाकांक्षा प्रस्तुत किये। काका ने इन्हें मुगलों से भयभीत किया। काका से ये खिन्न हो गये। बड़े भाई से सलाह किये। दोनों भाई एकलक्ष्य पर दृढ़ हो गये। बुन्देलखण्ड राज्य की स्थापना इनका संयुक्त लक्ष्य हुआ।

सेना के लिये धन की व्यवस्था इन्होंने गाँव में रखे माता के कुछ गहने बेचकर लगभग तीन सौ सैनिक जीवट के तैयार किये और जीवनव्यापी युद्ध में कूद पड़े। नित्य सैनिकों में वृद्धि, सैनिक साजसमान पर ध्यान, बुन्देलों की सुरक्षा और धन-संग्रह, रसद पर ध्यान इनकी प्रथम वरीयता थे। शत्रु की भारी सेना के सामने अपनी सेना ऐसे ढंग से हटाते थे कि वैरी समझता था ये डर कर भाग चले, पर अचानक उलटकर ऐसा आक्रमण छापामार शैली में करते थे कि वैरी को हारना पड़ता था। शत्रु के हथियार, रसद, तोपें, घोड़े, हाथी इनकी प्रथम प्राथमिकता होते थे। सारी संपत्ति शत्रु की लूट लेते थे। बहुत सा धन सैनिकों को पुरस्कार में बाँट देते थे। औरंगजेब बहुत चिन्तित हो गया। इनके भाई सेना का संचालन करते थे। पहाड़ी प्रदेशों को इन्होंने अपना रणक्षेत्र ऐसा बनाया था कि भारी संख्या की सेना उस जाल में फँस जाती थी और हार जाती थी। मैदानी इलाकों में इनके सैनिक उतरने से बचते थे। अभी दीख पड़े अभी न जाने कैसे कहाँ ओझल। हर बुन्देल इनकी विजय हेतु अपने सहयोग देने को तैयार रहता। वृहत्तर बुन्देलखण्ड राज्य में प्रजा सुखी थी। हर व्यक्ति बेरोक टोक छत्रसाल से मिल सकता था। शिवाजी इनसे बड़े थे। एक बार छत्रसाल शिवाजी से मिलने गये भी थे।

शिवाजी ने इनका बड़ा सम्मान किया और हिन्दू धर्म के उत्थान हेतु संघर्ष करने और सफल होने का आशीर्वाद दिया। शिवाजी के गुरु जैसे समर्थ रामदास थे, वैसे ही छत्रसाल के गुरु प्राणनाथ थे। बाबा प्राणनाथ ने छत्रसाल को आशीष देते हुए कहा था- छत्रा तेरे राज्य में धक धक धरती होय। जित जित घोड़ा मुख करे तित तित फत्ते होय।। छत्तरपुर नगर छत्रसाल ने बसाया। भूषण शिवा जी के बाद छत्रसाल के पास आये। भूषण की पालकी में छत्रसाल ने कन्धा लगा दिया। भूषण कूद पड़े और बोले- महाराज! यह आपने क्या किया?' छत्रसाल ने कहा, 'मैं शिवाजी की समानता नहीं कर सकता। मैंने उसी से कंधा लगा दिया। मैं कविता की चाकरी कर रहा हूँ। शिवाजी के बाद पेशवा बाजी राव से उन्होंने सहायता माँगी और पाया था। ८३ वर्ष की उम्र में सन् १७३१ में इनका निधन हो गया।

(फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी के लेख)

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