सम्राट चन्द्रगुप्त का जन्म ३२४ ई.पू. एवं निधन ३०० ई.पू. में हुआ था। एक साधारण व्यक्ति के रूप में बचपन का चन्द्रगुप्त एक महान सम्राट और साम्राज्य निर्माता हुए। ग्रीक लेखक जस्टिन इन्हें साधारण कुल का, जैनग्रंथ ग्रामप्रधान का पुत्र, जहाँ मोरों की संख्या प्रधान थी और विशाखदत्त की मुद्राराक्षस में निम्न कुल का मानते मिलते हैं। चन्द्रगुप्त को 'वृषल' कहा गया है, जिसका तात्पर्य 'धर्मच्युत क्षत्रिय' हैं। चन्द्रगुप्त हीनकुल या शूद्र होते तो चाणक्य इन्हें न स्वीकारते, क्योंकि शूद्र घनानन्द के मूलोच्छेद के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ थे। शूद्र को हटाकर शूद्र के हाथ में चाणक्य शासन न सौंपते। ब्राह्मण क्षत्रिय हाथ में ही शासन होने के पक्षधर रहे हैं। 'महव वंस' जैसे बौद्धग्रंथ और अन्य जैनग्रंथ इन्हें क्षत्रिय मानते हैं।

उत्तर प्रदेश के पल्लिवन में शासन करने वाले 'मोरिय' क्षत्रिय वंश के चन्द्रगुप्त कहे जाते हैं। इनकी मां पति के निधन पर सुरक्षा हेतु पाटलिपुत्र चली गयीं, जहाँ चन्द्रगुप्त का जन्म हुआ। पहले एक ग्वाले ने बाद में एक शिकारी ने इनका पालन किया। शैशवकाल में बालमंडली के साथ सम्राट और न्याय के खेल जब ये खेल रहे थे तो चाणक्य उधर से होकर जाते हुए देखे-सुने और बड़े प्रभावित हुए। चाणक्य चन्द्रगुप्त को शिक्षित करने के लिए तक्षशिला ले आये, जहाँ के ये कुलपति थे। ८ वर्ष तक यहाँ विशेष शिक्षा पाये। ग्रीक आक्रमण में से देश की रक्षा और अयोग्य घनानन्द के नन्द साम्राज्य का उच्छेद इनका संकल्प था।

चन्द्रगुप्त की भेंट सिकन्दर से भी हुई थी। इनकी स्पष्टवादिता से इन्हें मार डालने का आदेश सिकन्दर ने दिया, पर चन्द्रगुप्त  तक चला गया था वापस, जब युद्धप्रिय जनजातियों को सेना में भर्ती चाणक्य- चन्द्रगुप्त ने करना आरंभ किया। विदेशी यूनानी भारत से निकाले जायं - ऐसा आदर्श एक जनसामान्य के सामने रखा गया। इसमें एक पहाड़ी पर्वतक से बड़ी सहायता मिली। उधर यूनानी भी अपने देश जाने के लिये लालायित थे ही। भारतीय क्षत्रियों ने भी यूनानियों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया था। ३२५ ई.पू. में उत्तरी सिन्ध के यूनानी क्षत्रिय फिलिप की हत्या और ३२३ में सिकन्दर के निधन ने चन्द्रगुप्त के लक्ष्य को शक्ति दी। सारे यूनानी पंजाब से निकाल दिये गये। ३१६ ई.पू. अंतिम यूनानी क्षत्रप भी चला गया भारत से। सारे सिन्ध-पंजाब में चन्द्रगुप्त का अधिकार हो गया। अब मगध की ओर मुड़े चन्द्रगुप्त। आन्तरिक विद्रोह, कुचक्र, की कड़ियाँ बनाकर दो-एक बार की असफलता के बाद अंतत: चन्द्रगुप्त ने भीषण प्रत्यक्ष युद्ध में घनानन्द का वध कर मगध पर अधिकार कर लिया। ३०५ ई.पू. में सेल्यूकस से इनका युद्ध हुआ।

सेल्यूकस हारा और अपनी बेटी हेलन का इनसे विवाह कर दहेज में भारत के उत्तर-पश्चिम के सारे क्षेत्र सौंप दिये, जिनकी राजधानियाँ हिरात, कान्धार और काबुल थीं। बलूचिस्तान भी इनमें था। आज का सारा अफगानिस्तान बलूचिस्तान, पर्शिया (ईरान) चन्द्रगुप्त के राज्य में मिल गया। जूनागढ़ के रुद्रदामन अभिलेख से पता चलता है सौराष्ट्र (गुजरात) में चन्द्रगुप्त का प्रान्तपति शासक था। मालवा, अवन्ति के प्रदेश, इनकी राज्यसीमा में थे। तमिल साक्ष्यों से पता चलता है दक्षिण भारत के अधिकांश हिस्से इनके शासन में थे। बिन्दुसार को लड़ाई करनी नहीं पड़ी। अशोक केवल कलिंग जीता। इससे पता चलता है सारे भागों पर चन्द्रगुप्त ने शासन का विस्तार पहले ही कर दिया था। केवल, कर्नाटक, ट्रावनकोर, मदुरा, कुर्ग, दक्षिणी कन्नड़, दक्षिणी मैसूर और आसपास के क्षेत्रों (चदेल और पाण्ड्य शासकों) को छोड़ सारे दक्षिण भारत पर चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन था। अंतिम समय में, जैन साक्ष्यों के अनुसार जैनमुनि भद्रबाहु के साथ चन्द्रगुप्त मौर्य मैसूर आ गये और श्रावणबेल गोला में अनशन कर देहत्याग दिया। उस स्थान को 'चन्द्रगिरि' कहा जाता है।

वहीं चन्द्रगुप्त मौर्य द्वारा बनवाया हुआ 'चन्द्रगुप्त बस्ती' नामक एक मन्दिर भी है। सामान्य व्यक्ति की तरह आरंभ कर सम्राट के रूप में जीवन व्यतीत करने वाले चन्द्रगुप्त का स्वेच्छया अंतिम दिन भी साधारण रूप में ही बीता।

(फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी के लेख)

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