राजा अम्बरीष भारत में दो नाभाग हुए हैं। एक दिष्टि के पुत्र नाभाग थे और दूसरे मनुपुत्र नभग के पुत्र नाभाग। इन द्वितीय नाभाग के पुत्र हुए अम्बरीष। अम्बरीष भौतिक उत्कर्ष के साथ सत्य, परोपकार, जनहित, आत्मसंयम और सहिष्णुता के आन्तरिक गुणों से समृद्ध सम्राट थे। राष्ट्रीय हित के अनुष्ठान ये करते रहते थे। तत्कालीन भूमण्डलीकरण में पृथ्वी के सातों द्वीपों के राजैश्वर्य में राजा अम्बरीष सबके हृदयों तक पर शासन करते थे। शासन-प्रशासन के आभामण्डल को जलते दीप की भाँति क्षणिक मानते थे राजर्षि अम्बरीष। राज्य-सम्पदा एक यज्ञ है-चराचर सह- अस्तित्व के कल्याण का अनुष्ठान-ऐसा राजनीतिक चिन्तन था राजा अम्बरीष का। आज की इकोलोजी की सदी संत्रासों से मुक्त धरती के हित में 'धन्व' नामक निर्जल शुष्क देश में सरसता की जलधार की लोकहितकारी योजना चालू कर एक अनुष्ठान की निष्ठा में समृद्धि और वैभव की शक्ति जागृत करने वाले सरस्वती नदी के प्रवाह के सामने वसिष्ठ, असित, गौतम आदि आचार्यों के नेतृत्व में भारी लागत के अनेक अश्वमेध यज्ञ किये राजा अम्बरीष ने।

प्रजा विपन्नता, शोषण, कुपोषण, दमन और संत्रासों से मुक्त इस राजकीय योजना से लाभान्वित होकर सौहार्द, सच्चरित्रता के सद्गुणों को बढ़ाने वाला सत्संग करने लगी इस राजकीय संस्कृति में। राजा अम्बरीष ने प्राकृतिक संसाधनों, जल संसाधनों, वैचारिक संसाधनों के साथ पशु-धन और स्वर्णमान के साथ राजकीय मुद्राओं सहित करोड़ों गायें जनहितकारी चिन्तकों, मनीषियों, ऋषियों, ब्राह्मणों को अनुदान में दिया। उस समय आजकल की तरह करेंसी' प्रधान जन-जन में 'मनीफोबिया' की आर्थिक बीमारी नहीं थी भारत में। अक्षयकोष, अजस्र धरती, प्राकृतिक संसाधन, पशु-धन, कृषि, उद्योग, व्यापार से समृद्ध अम्बरीष के नेतृत्व में सारा राष्ट्र और इसकी राजनीतिक हलचलें एक यज्ञमय अनुष्ठान बन गये थे। फिर भी, अम्बरीष दंभी नहीं, विनम्र होते जा रहे थे। इनकी दृष्टि में यह सब ईश्वर करवा रहा था। राजा अम्बरीष ने एक बार अपनी धर्मपत्नी के साथ द्वादशी प्रधान एकादशी व्रत वर्षभर का धारण किया।

इस व्रत का मानसिक अर्थ था-ये अभ्यास करें आचरण की प्रयोगभूमि में कि यह राज्य-सम्पदा और उपभोक्ता-शक्ति सब उनकी निजी निधि नहीं, ईश्वर की है। व्रत पूर्ण हुआ। इस व्रत की सफलता के उपलक्ष पर कार्तिक मास में राजा अम्बरीष ने तीन रात का उपवास किया। आशय इनका था तन-मन-धन के त्रिकोणात्मक प्रदूषणों का आस्वाद न लेकर सत्याभिमान, राज्याभिमान और दुर्जनद्वेष तथा सज्जन राग से मुक्त हरि इच्छा बलीयसी' सूत्रमें राजधर्म को आत्मोन्नति में लय कर दें। लोग अपने दुर्गुणों के कारागार में भ्रष्टाचार की हथकड़ी-बेड़ी में बन्दी न हों। गरीबों की भूख का अनुभव राजा अम्बरीष उपवास रखकर करते हुए कैसा अनोखा यज्ञ कर रहे थे ! उपवास की सफलता पर यमुना जी में स्नान कर मधुवन में ईश्वर के प्रति कृतज्ञता में नैवेद्य- ग्रहण का इन्होंने अनुष्ठान किया।

राज्य-भण्डारण ईश्वरीय नैवेद्य था और हर भूखा-कुपोषित, समृद्धों और सम्पन्नों के साथ बैठकर स्वास्थ्य और स्वादवर्द्धक नैवेद्य का रसास्वादन करने का यह अम्बरीष-अनुष्ठान लोकशक्ति का नूतन जागरण था। पुनः पशुधन का अभिनन्दन किया राजा ने और दूधारू गायें करोड़ों की संख्या में राष्ट्रीय चिन्तकों को अनुदान में अर्पित की। हर गाय की सींगें स्वर्णपत्र जड़ित और खुर चाँदी पत्र जड़ित थीं। राजकीय कोष जन-जन के लिए अनुदानित मुक्तहस्त करा दिया गया था। कैसी थी राजस्व-वसूली ईश्वरार्पित! राजकोष खाली करने की होड़ राजा ने पैदा कर दी थी-जनहित में और राष्ट्र के समृद्ध उच्च वर्ग के उद्योगपति राजकोष को भर डालने में आनन्दित होने लगे थे। कर वसूली विभाग अनुदान में रात-दिन डटा था और व्यापारी वर्ग कोष भरने में इनसे आगे बढ़ जाना चाहता था! ऐसे अद्भुत भारत के अद्भुत दिन के अद्भुत राजा थे राजा अम्बरीष। दान, अनुदान के उस दिन के सारे कार्यों को पूर्ण कर राजा अम्बरीष जैसे ही पारण करने को उद्यत हुए, उसी समय शाप और वरदान दोनों ही देने में सहज ऋषि दुर्वासा जी अतिथि रूप में इनके यहाँ पधारे। राजा अम्बरीष ने हर्ष के साथ इनकी अगवानी की और नमन करते हुए भोजन की प्रार्थना की। प्रार्थना स्वीकार कर दुर्वासा ऋषि यमुना स्नान-ध्यान के लिये चले गये। तरंगी ध्यान योगी ऋषि दुर्वासा यमुना में स्नान के समय समय का ध्यान नहीं रखे और इधर द्वादशी मात्र घड़ी भर बच रही थी।

बड़ा ही धर्मसंकट था यह। सारी साधना दाँव पर थी-पारण का मुहूर्त बीत जाता और राजा पारण न कर लेते तो सारा अनुष्ठान निष्फल जाता। समय, इसका मुहूर्त ही सब कुछ है। समय बड़ा बलवान होता है! ब्रह्मविद् मनीषियों से परामर्श लिया राजा ने। ब्रह्मनिष्ठ महान योगी को बिना खिलाये भोजन ग्रहण करना या द्वादशी रहते पारण न करना दोनों ही दोष हैं। ऐसे में राष्ट्रीय हित किसमें है, प्रदूषण से मुक्ति की क्या प्रणाली अपनायी जाय-यह विचारणीय विन्दु था राजा का। ब्राह्मण परिषद ने मंथन करने के बाद व्यवस्था दी-'श्रुतियाँ हमारी आचार संहिता की नींव हैं। श्रुतियों ने व्यवस्था दी है-'जल पी लेना आहार करना भी है और नहीं भी करना है। अतः जलाहार से पारण कर सकते हैं।' राजा ने ईश्वर का ध्यान करके जल से पारण कर लिया और दुर्वासा जी की प्रतीक्षा करने लगे। दुर्वासा जी लौटे तो राजा की स्थिरतासे उन्होंने अनुमान कर लिया कि राजा ने पारण कर लिया है। दुर्वासा जी उद्वेलित हो गये और क्रोधित होकर बोल पड़े-'धनमद में राजा! तू अंधा है। भगवद्- भक्ति तो छू भी नहीं गयी है तुझे। मुझे भोजन के लिये खुद आमंत्रित किया और बिना मुझे खिलाये खा लिया! ऐसे धर्महीन राजा को दंडित करना आवश्यक है।' ऐसी उत्तेजना में तंत्रयोगी दुर्वासा ने एक आतंकवादी कृत्या अपने जटाजूट से एक बाल उखाड़ कर पैदा कर आदेश दिया-'अम्बरीष को मार डाल!' क्रोध सबसे बड़ी कृत्या है, जो सदाशयता, विनम्रता और जनप्रेमी निष्ठा को, सद्भावना को मिटाने पर आमादा रहती है! राजा उस दहकती आवेशमयी अग्नि ज्वाला से विचलित नहीं हुए, न डिगे।

ईश्वर सबका रक्षक है। सुदर्शन चक्र कृत्या को भस्म कर दुर्वासा की ओर बढ़ा। आत्मनिष्ठ यह ज्ञानचक्र-विवेकमण्डल-था, जिसने क्रोध मिटा दिया और क्रोधी की ओर लपका। क्रोधी खुद अपनी क्रोध की लपट में दहकता हैरान हतप्रभ राजा के ईश्वर-प्रेम से घबराया भाग चला। दिशाओं, आकाश, पृथ्वी, अतल-वितल आदि अधोलोक, समुद्र, लोकपाल, स्वर्ग सभी स्थानों पर शरणार्थी बन भागता फिरा। पर, क्रोध और विकार की आग को कहीं भी ठिकाना नहीं मिला! आतंकवाद कहीं भी टिक नहीं पाता। ब्रह्मा, विष्णु, महेश (जो गॉड के रूप में 'जी' जेनरेट (सृजनकर्ता ब्रह्मा) 'ओ' (आर्गनाइजर-पालक विष्णु और) 'डी' (डिस्ट्रक्टवायर-प्रलयंकर रुद्र) के हर स्तर पर आत्मरक्षा की गुहार आत्म विकार की क्रोधाभिभृत अन्तर्वाला से उत्पीड़ित दुर्वासा ने किया। श्रष्टा, पालक और संहारक-तीनों विकेन्द्रित इकाइयों ने अपनी असमर्थता व्यक्त करते हुए कहा-'श्रुतियाँ हमारी ईश्वरीय संविधान हैं, जो चराचर (इक्कीसवीं सदी मसीह की इकोलोजी से इसे जाना जायेगा) के बीच सचेतन प्रेम की बागडोर संभालने हेतु व्यवस्थित है। लोकहितकारी कार्ययोजनाओं को भजन की तरह लेकर जो राष्ट्र-यज्ञ में समर्पित है, जो विनम्र है (अक्रोधी है, तुम्हारी तरह क्रोधी नहीं), जिसके राज्य में आतंकवाद है ही नहीं, क्योंकि कोई क्रूर और हिंसक नहीं है, सब ईश्वर प्रेमी हैं। ऐसे जनप्रिय राजा को तुमने मारना चाहा! अपनी शक्ति का अपव्यय किया? हम सबमें से किसी के पास ऐसी सामर्थ्य नहीं है, जो तुम्हें बचा सके! राजा अम्बरीष ही तुम्हें बचा सकते हैं। उन्हीं की शरण लो!' हतप्रभ दुर्वासा भागते हुए आये और अम्बरीष के पैर पकड़ लिये।

लज्जित अम्बरीष ने भगवान के सुदर्शन चक्र की वन्दना की और प्रार्थना किया-'यदि मैं जीवनभर और मेरे पूर्वजों ने अपने-अपने जीवनभर में एक भी राष्ट्रीय चिन्तक, मनीषी, योगी, महात्मा और साधक को बिना सम्मानित किये और राज्य-सम्पदा के नैवेद्य रूप में उसे बिना अंशदान दिये, बिना पुरस्कृत किये यदि कभी भी न खाया हो-तो आप महर्षि दुर्वासा की जलन मिटा दें। दुर्वासा जी का हृदय शीतल हो जाय। मैं किसी की पीड़ा और भय का कारण नहीं बनूं।' दुर्वासा जी पर सुदर्शन शांत हो गया। अम्बरीष ने कहा-'महर्षि! पूरे एक वर्ष बाद आप पुनः पधारे हैं। आप इस बीच कुछ भोजन नहीं ग्रहण किये हैं। इससे व्यथित मैं भी अभी तक जलाहार ही लेता रहा हूँ। चलें आप नैवेद्य ग्रहण करें। आप भोजन कर लें तभी मैं अन्नाहार लूँगा। आपकी तृप्ति से बढ़कर मेरे रसास्वादन का आधार अन्न, सम्पन्न की सम्पन्नता, ऋद्धि, समृद्धि कुछ भी नहीं है। भोजन तो ईश्वरीय स्वाद का अनुदान और अनुष्ठान हैं।

यह राज्य- रस भी ईश्वर का नैवेद्य है। ईश्वर की इच्छा से इसे ग्रहण करें, जिससे राष्ट्र कृतज्ञ हो और यह लोक-शक्ति का अनुष्ठान सफल हो! दुर्वासा गद्गद् हो उठे और बोले-राजन्! आप करुणाशील हैं। मैं आपका, आपके राष्ट्रीय हित के अनुष्ठान का अपराधी था, फिर भी क्षमामय होकर आपने मुझपर अनुग्रह किया है। आप भोजन रूप में नैवेद्य दें। आपसे ईश्वर निष्ठा मेरी बढ़ी है। राजा ययाति प्रतापी राजा नहुष के छ: पुत्र थे-यति, ययाति, संयापि, आयति, वियात और कृति। राजा नहुष बड़े पुत्र यति को राज्यभार देना चाहते थे, पर वह वीतरा निकला। इन्द्र पत्नी शची से सहवास की कुचेष्टा से ब्राह्मण ने इन्द्र पद पाये राजा नहुष को इन्द्र पद से च्युत कर अजगर बना दिया था। ऐसे राजा के पद पर ययाति बैठे। चारों भाइयों को चारों दिशाओं में नियुक्त कर दिया। क्षत्रिय होकर भी ब्राह्मण शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी और दैत्यराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से राजा ययाति का विवाह हुआ। राजनीति के सेतु से होकर भोग से योग का अद्भुत इतिहास है राजा ययाति का जीवन।

दैत्यराज वृषपर्वा की मानिनी कन्या शर्मिष्ठा थी। एक दिन अपनी गुरुपुत्री देवयानी और हजारों सखियों के साथ एक सुन्दर उद्यान में घूमने शर्मिष्ठा गयी। वहाँ सरोवर में जलक्रीड़ा सबने की। भूलवश शर्मिष्ठा ने देवयानी के वस्त्र पहन लिये अपना समझकर। देवयानी क्रोधित होकर बोली- एक तो तेरा पिता असुर, फिर हमारा शिष्य! हम हैं ब्राह्मण श्रेष्ठ भृगुवंशी और हमारे पवित्र वस्त्र तूने पहन लिये?' दैत्यकन्या शर्मिष्ठा नागिन की तरह फूत्कारती देवयानी के पहने वस्त्र छीनकर उसे कुएं में धकेल दी और सारी सहेलियों के साथ चलती बनी। देवयानी दुःखी होकर रोने लगी कुएँ में पड़ी नग्न शरीर! शर्मिष्ठा के जाने के बाद संयोगवश उधर से राजा ययाति निकले। प्यासे वे कुएँ में झाँके तो देवयानी दीख पड़ी। वह वस्त्रहीन थी। ययाति ने अपना दुपट्टा उसे दे दिया और दयालुतावश अपना हाथ उसे देकर कुएँ से बाहर किया। देवयानी ने कहा-'अब यह हाथ मैं किसी अन्य को नहीं दूंगी। यह जीवन आपको अर्पित किया।' वृहस्पति का पुत्र कच मेरे पिता शुक्राचार्य से मृत संजीवनी विद्या पढ़ा था। पढ़ाई पूरी कर वह जब जाने लगा तो देवयानी ने उससे विवाह का प्रस्ताव किया। पर, गुरुपुत्री होने से कच ने नकार दिया। इस पर देवयानी ने शाप दिया कि कच की पढ़ी विद्या निष्फल हो जाय। कंच ने भी देवयानी को शाप दिया कि उसका विवाह किसी ब्राह्मण लड़के से न हो।

इस शाप से क्षत्रिय ययाति से ब्राह्मण देवयानी के विवाह की संभावना देवयानी ने सद्यः संभावित दिखायी प्रारब्ध के अधीन। ययाति ने बात मान ली। देवयानी वहाँ से घर लौटी, पिता शुक्राचार्य से सारी बातें बतायी। शुक्राचार्य क्षुब्ध हो गये। वे देवयानी को लेकर नगर से निकल पड़े। शाप देने या शत्रुपक्ष से मिल जाने के भय से वृषपर्वा शुक्राचार्य को मनाने में ही हित समझा। शुक्राचार्य ने कहा- 'मैं अपनी पुत्री देवयानी के अपमान और उपेक्षा को अपना तिरस्कार मानता हूँ। देवयानी जैसा चाहे, वैसा करो, तभी मैं लौट सकता हूँ।' वृषपर्वा ने शर्त मान ली। देवयानी ने कहा-'मेरे पिता जिस किसी को मुझे दें और मैं जहाँ कहीं जाऊँ शर्मिष्ठा अपनी सहेलियों के साथ मेरी सेवा में वहीं चले।' शर्मिष्ठा ने भी परिवार के संकट टालने हेतु देवयानी की बात मान ली। विवाह के समय शुक्राचार्य ने कहा ययाति से-'राजन शर्मिष्ठा को सेज पर कभी सोने मत देना। देवयानी ही तुम्हारी अंकशायिनी है।' देवयानी कुछ समय बाद पुत्रवती हो गयी।

शर्मिष्ठा ने भी एकान्त में ययाति से पुत्र कामना की। इस प्रकार देवयानी से दो पुत्र हुए-यदु और तुर्वसु। वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए-द्रुह्यु, अनु और पूरु। पूरु से ही भरतवंश में पाण्डव हुए आगे चलकर। पता चल ही गया कि शर्मिष्ठा के तीनों पुत्र ययाति से ही हैं। क्रुद्ध देवयानी पिता के पास आयी और रो-रोकर सारी बातें शुक्राचार्य से बतायीं। ययाति भी देवयानी को मनाने पहुँच चुके थे। शुक्राचार्य ने ययाति को शाप दे दिया-'तुम्हें बुढ़ापा आ जाय।' ययाति ने कहा-'आपके शाप से आपकी पुत्री देवयानी का अनिष्ट है।' शुक्राचार्य ने कहा- 'अच्छा प्रसन्नता से जो तुम्हें अपनी युवानी दे दे उससे अपना बुढ़ापा बदल लो।' ययाति ने अपने सभी पुत्रों में एक-एक से यौवन मांगा। पर, यदु और तुर्वसु- देवयानी पुत्र तैयार नहीं हुए। शर्मिष्ठा के भी द्रुह्यु और अनु भी तैयार नहीं हुए। पर, पूरु ने पिता में निष्ठा व्यक्त करते हुए बुढ़ापा ले लिया और अपना यौवन ययाति को दे दिया।

ययाति सातों द्वीपों के एकछत्र सम्राट थे। इन्द्रियाँ भोग से तृप्त नहीं हो सकी। फिर ययाति को वैराग्य हुआ। जीवन व्यर्थ गया- ऐसी आत्मग्लानि हुई इन्हें। ययाति ने दक्षिण पूर्व दिशा में द्रुह्यु, दक्षिण में की सारी संपत्तियों को पूरु के हवाले किया और बड़े भाइयों को पूरु के अधीन कर दिया। ययाति अब वन की ओर चल पड़े। आत्मसाक्षात्कार से त्रिगुण मय लिंग शरीर नष्ट कर डाला। देवयानी ने सुना तो भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करती उन्होंने लिंग शरीर त्याग दिया। इस प्रकार ययाति और देवयानी ने देहत्याग कर भगवान श्रीकृष्ण के ध्यान में प्राणों का त्याग कर दिया। ऐसे होते थे भारत में सम्राट और उनके राजनीतिक दर्शन। राजर्षि ऋषभदेव ब्रह्मा के मानस पुत्र स्वायंभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत आत्मविद्या में निमग्न राज्यशासन से वीतराग थे। ये ब्रह्मा के ही मानस पुत्र नारद जी से दीक्षा लेना चाहते थे कि ब्रह्मा जी ने आकर प्रियव्रत को ईश्वर की इच्छा से राज्य भोग का आदेश दिया।

बड़ों का मान रखने के लिये प्रियव्रत ने प्रजापति विश्वकर्मा की पुत्री बर्हिष्मती से विवाह किया, जिससे आग्नीध्र, इध्मजिह्व, यज्ञबाहु, महावीर, हिरण्यरेता, घृतपृष्ठ, सवन, मेधातिथि, वीतिहोत्र और कवि-दस पुत्र और इनसे छोटी एक कन्या ऊर्ध्वस्वती का जन्म हुआ। इनमें कवि, महावीर और सबने बाल्यावस्था से ही नैष्ठिक ब्रह्मचारी हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत तीन पुत्र हुए, जो तीन मन्वन्तरों के समय-शासक हुए। राजा प्रियव्रत ने ग्यारह 'अर्बुद' वर्षों तक शासन किया। इन्होंने पृथ्वी की सात परिक्रमायें कर सात समुद्र तैयार किये, जिनसे सात द्वीप बने। ये थे-जम्बू, ह्यक्ष, शाल्मलि, कुश, क्रौंच, शाक और पुष्कर द्वीप। प्रत्येक द्वीप का राजा एक एक पुत्र को राजा प्रियव्रत ने बनाया। पुत्री ऊर्ध्वस्वती का विवाह शुक्राचार्य जी से किया। प्रियव्रत के पुत्र आग्नीध्र जम्बूद्वीप का शासन करने लगे। प्रियव्रत तपस्या में लीन हो गये।

पूर्वचिति नाम की ब्रह्मा की प्रेरणा से भेजी गयी अप्सरा से आग्नीध्र का विवाह हुआ, जिसके गर्भ से नाभि, किम्पुरुष, हरिवर्ष, इलावृत्त, रम्यक, हिरण्मय, कुरु, भद्राश्व और केतुमाल-ये नौ पुत्र पैदा हुए। राजा आग्नीध्र के बाद नाभि आदि नौ भाइयों ने मेरु की मरुदेवी, प्रतिरूपा, उग्रदंष्ट्री, लता, रम्या, श्यामा, नारी, भद्रा और देववीति नाम की नौ कन्याओं से विवाह किया। राजा नाभि सन्तानहीन थे। पत्नी मरुदेवी के साथ यज्ञपुरुष का भजन किया। ऋत्विजों के आह्वान पर यज्ञपुरुष भगवान प्रसन्न होकर प्रकट हुए बोले-मैं यज्ञ का प्रयोजन जान रहा हूँ। मैं स्वयं अपनी अंशकला से नाभि के यहाँ जन्म लूँगा। नाभि के यहाँ महारानी मरुदेवी के गर्भ से दिगंबर संन्यासी और ऊर्ध्वरेता मुनियों का धर्म प्रकट करने वाले ऋषभदेव जी का जन्म हुआ। ऋषभदेव जी जैनधर्म के प्रवर्तक पद पर ने एक बार वर्षा इनके राज्य में रोक दी। योगेश्वर भगवान  थे कि इन्द्र ने एक बार वर्षा इनके राज्य में रोक दी। योगेश्वर भगवान ऋषभदेव ने हँसकर अपनी योगमाया से अपने ‘वर्ष' अजनाभ खण्ड में खूब जल-वर्षा करायी। इस पुराण-पुरुष लीला विग्रह ऋषभदेव से मंत्रिमण्डल, नागरिक और सारा राष्ट्र-प्रेम करने लगा राजा नाभि ने इनका राज्याभिषेक कर पत्नी मरुदेवी के साथ बदरिकाश्रम चले गये तपस्या में लीन हो समय आने पर देहत्याग कर ईश्वर में प्राणों को विलीन कर दिया। राजा नाभि ऐसे तेजस्वी थे कि इनके पावन कर्मों का फल था कि श्रीहरि इनके पुत्र बनकर पैदा हुए ऋषभदेव रूप में, जिनसे जैनधर्म का आरंभ हुआ। उस समय इस देश का नाम था 'अजनाभ'। ऋषभदेव जी के पुत्र भरत से इस अजनाभ का नाम 'भारतवर्ष' पड़ा।

देवराज इन्द्र की प्रदत्ता उनकी कन्या जयन्ती से इन्होंने विवाह किया। श्रौत (वेद) स्मार्त (स्मृतियाँ) दोनों प्रकार से शास्त्रों के अनुसार कर्मानुष्ठान्न करने वाले ऋषभदेव जी को जयन्ती के गर्भ से सौ पुत्र पैदा हुए। यह योगचर्या की शक्ति थी! भरत जी जैसे महायोगी पहले पुत्र थे। इनसे छोटे कुशावर्त्त, इलावर्त्त, ब्रह्मावर्त्त, मलय, केतु, भद्रसेन, इन्द्रस्टैंक, विदर्भ और कीकट-ये नौ राजकुमार शेष नब्बे भाइयों से बड़े थे। इनसे छोटे थे-कवि, हरि, अन्तरिक्ष, प्रबुद्ध, पिप्पलायन, आविर्होत्र, द्रुमिल, चमस और करभाजन- ये भगवद् भक्त नौ पुत्र हुए। इनसे छोटे इक्यासी पुत्र विनीत और आज्ञाकारी हुए। ये कर्मशुद्धि के कारण क्षत्रियत्व से ऊपर उठ ब्राह्मण हो गये थे। ऋषभ देव जी ने ईश्वरीय निष्ठा का राज्य-शासन में ऐसा प्रशासन विकसित किया कि इन्द्रियाँ इनकी और राष्ट्र के हर नागरिक की आत्मनियंत्रण से शासनिक दक्षता में प्रवीण हो गयीं।

समय आने पर इन्होंने अपने सभी पुत्रों को बुलाकर आत्मधर्म का उपदेश दिया और ज्येष्ठ पुत्र भरत को राज्यसिंहासन पर बैठाकर स्वयं दिगम्बर होकर निकल पड़े। ये सर्वथा मौन हो गये। जड़, अंधे, बहरे, गूंगे हो चले। इन्द्रियों को सक्रिय रहने का अधिकार छीनकर आत्मा में विलीन कर दिया ऋषभदेव जी ने। अवधूतों की तरह यत्र-तत्र घूमने लगे। नगरों, गाँवों, खदानों, किसानों की बस्तियों, बगीचों, पहाड़ी, गाँवों, सैनिक-छावनियों, गोशालाओं, अहीरों की बस्तियों, पाथशालाओं, वनों, आश्रमों में विचरने लगे। कभी इन पर लड़के पत्थर फेंकते, कभी अपमानित करते, पर ये मौन सहन करते रहते। जनता को योग-साधना में विघ्न मानकर ये अजगर वृत्ति धारण कर लेटे ही लेटे खाते- पीते, मल-मूत्र त्यागने लगे।

पर, मल में दुर्गन्ध नहीं, सुगन्ध थी। फिर गोवृत्ति, मृगवृत्ति, काकादिवृत्ति ग्रहण कर लेटे-लेटे, खड़े-खड़े खाने-पीने लगे। इनमें अनेक सिद्धियाँ आ गयीं थीं। इस धरती पर ऋषभदेव जी का शरीर योगमाया से मुक्त विचरता हुआ कोंक, वेंक और दक्षिण आदि कुटक कर्णाटक देशों में रूप में कुटकाचल के वन में घूमने लगे। इसी बीच झंझा के झकोरों और बाँस के घर्षण से प्रबल दावाग्नि धधक उठी और उसने सारे वन को भस्म कर दिया। ऋषभदेव जी भी इस वैश्वानर की भस्म विभूति बन गये।

(फणीन्द्र नाथ चतुर्वेदी के लेख)

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