महाराजा रणजीत सिंह, जिन्हें आज भी ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से जाना जाता है| सिख साम्राज्य के पहले महाराजा थे| जिन्होंने १९वीं शताब्दी के शुरूवाती समय में उत्तर-पश्चिमी भारतीय उपमहाद्वीप पर शासन किया था। वह बचपन में देवी के रोग से बचे रहे लेकिन उनकी बाईं आँख की रोशनी चली गई। उन्होंने दस साल की उम्र में अपने पिता के साथ पहली लड़ाई पर गये थे| अपने पिता की मृत्यु के बाद, उन्होंने अपनी युवा उम्र में अफगानियों को बाहर निकालने के लिए कई युद्ध लड़े| २१साल की उम्र में उन्हें "पंजाब का महाराजा" घोषित किया गया था। १८३९तक उनके नेतृत्व में उनका साम्राज्य पंजाब क्षेत्र में विकसित हुआ।

महाराजा रणजीत सिंह के उदय से पहले, पंजाब क्षेत्र में कई युद्धरत संघ थे| जिनमें से बारह सिख शासकों और एक मुस्लिमो के अधीन थे। रणजीत सिंह ने सिख युद्धरत संघो को सफलतापूर्वक एकजुट किया और सिख साम्राज्य बनाने के लिए अन्य स्थानीय राज्यों पर कब्जा कर लिया। उन्होंने बाहरी सेनाओं, विशेषकर अफगानिस्तान से आने वाली सेनाओं के आक्रमणों को बार-बार हराया और अंग्रेजों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए थे।

रणजीत सिंह के शासनकाल ने सुधार, आधुनिकीकरण, बुनियादी ढाँचे में निवेश और सामान्य समृद्धि की शुरुआत हुई थी। उनकी खालसा सेना और सरकार में सिख, हिंदू, मुस्लिम और यूरोपीय शामिल थे। उनकी विरासत में सिख सांस्कृतिक और कलात्मक पुनर्जागरण की अवधि शामिल है, जिसमें अमृतसर में हरमंदिर साहिब के साथ-साथ तख्त श्री पटना साहिब, बिहार सहित अन्य प्रमुख गुरुद्वारों का पुनर्निर्माण शामिल है। उनके प्रायोजन के तहत हजूर साहिब नांदेड़, महाराष्ट्र। महाराजा रणजीत सिंह को उनके पुत्र महाराजा खड़क सिंह ने उत्तराधिकारी बनाया।

धार्मिक नीतियाँ

उस समय के कई पंजाबियों के नुसार रणजीत सिंह एक धर्मनिरपेक्ष राजा थे| उन्होंने सिख धर्म का अनुसरण किया था। उनकी नीतियाँ सभी समुदायों, हिंदू, सिख और मुस्लिम के सम्मान पर आधारित थीं। वे एक समर्पित सिख राजा थे, रणजीत सिंह ने बहोत ऐतिहासिक सिख गुरुद्वारों का जीर्णोद्धार और निर्माण किया था| सबसे प्रसिद्ध, हरमंदिर साहिब| वह हिंदुओं के मंदिरों में भी शामिल हो गए और हिंदू भावनाओं के सम्मान में गो हत्या पर रोक लगा दी। उन्होंने अपने सैनिकों को नागरिकों से सम्मान से पेश आने का आदेश दिया।

उन्होंने कई गुरुद्वारों, हिंदू मंदिरों और यहां तक ​​कि मस्जिदों का निर्माण किया| विशेष रूप से माई मोरन मस्जिद बनाई थी जिसे, उन्होंने अपनी प्यारी मुस्लिम पत्नी मोरन सरकार के लिए बनवाया था। सिंह के नेतृत्व में सिखों ने कभी भी दुश्मन के पूजा स्थलों को गिराया नहीं था। हालाँकि, उन्होंने मुस्लिम मस्जिदों को अन्य उपयोगों में बदल दिया। उदाहरण के लिए, रणजीत सिंह की सेना ने लाहौर की बादशाही मस्जिद पर अतिक्रमण कर दिया और इसे गोला-बारूद की दुकान और घोड़ों के अस्तबल में बदल दिया। लाहौर की मोती मस्जिद को सिख सेनाद्वारा "मोती मंदिर" (मोती मंदिर) में बदल दिया गया था| सुनेहरी मस्जिद को सिख गुरुद्वारा में परिवर्तित कर दिया गया था, लेकिन सूफी फकीर सतार शाह बुखारी के अनुरोध पर, रणजीत सिंह ने वापस एक मस्जिद में तबदील किया। लाहौर की बेगम शाही मस्जिद का इस्तेमाल बारूद के कारखाने के रूप में भी किया जाता था, जिससे इसे बरुदखाना वाली मस्जिद, या "गनपाउडर मस्जिद" का उपनाम मिला।

सिंह के आधिपत्य को अफगान और पंजाबी मुसलमानों ने स्वीकार कर लिया था| जिन्होंने नादिर शाह और अजीम खान की अफगान सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ी। उनका दरबार, संरचना में विश्वव्यापी था| 

उनके प्रधान मंत्री ध्यान सिंह एक डोगरा थे, उनके विदेश मंत्री फकीर अजीजुद्दीन, एक मुसलमान थे| उनके वित्त मंत्री दीना नाथ, एक ब्राह्मण थे। मियाँ घौसा जैसे तोपख़ाने के अधिकारी भी मुसलमान थे। उनके समय में कोई जबरन धर्मांतरण नहीं हुआ था। उनकी पत्नियों बीबी मोहरन, गिलबहार बेगम ने अपना विश्वास बनाए रखा और उनकी हिंदू पत्नियों ने भी।

सिंह को सिखों को एकजुट करने और समृद्ध सिख साम्राज्य की स्थापना के लिए याद किया जाता है। उन्हें उनकी विजय और साम्राज्य की रक्षा के लिए एक अच्छी तरह से प्रशिक्षित, आत्मनिर्भर खालसा सेना के निर्माण के लिए भी याद किया जाता है। उन्होंने अफगानिस्तान के शुजा शाह दुर्रानी से कोहिनूर हीरे का कब्जा हासिल करने सहित काफी संपत्ति, जिसे उन्होंने १८३९ में ओडिशा के पुरी में जगन्नाथ मंदिर को अर्जित कर दी थी।

स्वर्ण मंदिर गुरुद्वारा

शायद सिंह की सबसे स्थायी विरासत हरमंदिर साहिब का जीर्णोद्धार और विस्तार था, जो सिखों का सबसे सम्मानित गुरुद्वारा है, जिसे अब "स्वर्ण मंदिर" के रूप में जाना जाता है। हरमंदिर साहिब में ग्लायडिंग और मार्बलवर्क के रूप में आधुनिक सजावट का अधिकांश हिस्सा सिंह के संरक्षण में पेश किया गया था, जिन्होंने मंदिर से संबंधित सुरक्षा और संचालन को मजबूत करने के हेतु सुरक्षात्मक दीवारों और जल आपूर्ति प्रणाली को भी प्रायोजित किया था। उन्होंने दो सबसे पवित्र सिख मंदिरों के निर्माण का भी निर्देश दिया, जो क्रमशः गुरु गोबिंद सिंह - तख्त श्री पटना साहिब और तख्त श्री हजूर साहिब की जन्मस्थली और हत्या का स्थान है - जिनकी उन्होंने बहुत प्रशंसा की गयी थी। यह थे रणजीत सिंग जिन्होने सिख धर्म को नयी ऊँचाई पे रख दिया।

Listen to auto generated audio of this chapter
Please join our telegram group for more such stories and updates.

Books related to भारत के जनप्रिय सम्राट