जिस क्षण राजा ने अंगूठी देखी उसी क्षण उनकी स्मृति लौट आई। जो कुछ महर्षि कण्व के आश्रम में हुआ था उन्हें सब कुछ याद आ गया। उन्हें शकुन्तला के साथ बिताये हुए सुन्दर समय की और अपने गुप्त विवाह की बात भी याद आ गई। उन वायदों की भी याद आ गई जो उन्होंने शकुन्तला से किए थे।

अंगूठी की भेंट और चलते समय यह कहना कि वह उसे जल्दी ही बुला लेंगे यह सब भी याद आ गया। राजा शकुन्तला को पहचान नहीं सके। यह सोच-सोचकर बहुत दुखी हुए। 

शकुन्तला के आने पर उन्होंने जो व्यवहार उसके साथ किया उसके लिए उन्हें बहुत अनुताप हो रहा था। उनकी वेदना की कोई सीमा नहीं थी-वह यह नहीं जानते थे कि उनकी स्मरण शक्ति चले जाने का कारण दुर्वासा का श्राप था। दुष्यन्त को लगा कि अनजाने में उनसे इतना बड़ा पाप हो गया है कि वह स्वयं को क्षमा नहीं कर सकते।

अब उनके जीवन में कोई खुशी या मनोरंजन की बात नहीं रह गयी थी। उन्होंने अच्छे कपड़े और आभूषण पहनने बन्द कर दिये और आदेश दिया कि महल में किसी प्रकार का उत्सव या मनोरंजन न किया जाय।

वह शकुन्तला को खोजने के लिए हर कोशिश करना चाहते थे लेकिन नहीं जानते थे कि वह कहां मिलेगी। उन्होंने सोचा शायद महर्षि कण्व इस मामले में उनकी सहायता कर सकें। उन्होंने अपने एक विश्वसनीय सभासद को बुलाया और महर्षि कण्व के पास भेजा कि अपनी प्रिय पत्नी की खोज में वे उनकी सहायता करें।

सन्देशवाहक ने लौटकर बताया कि यह सब ऋषि दुर्वासा के श्राप के कारण हुआ। उसने यह भी बताया कि शकुन्तला वहां नहीं है। उन्हें यह भी पता नहीं कि जब सफेद कपड़ों वाली आकृति उसे उठा ले गई तो उसके बाद क्या हुआ।

महर्षि कण्व की राय है कि वह आकृति हो न हो शकुन्तला की माता मेनका की थी। अपनी बच्ची को दयनीय और असहाय स्थिति में देख- कर वह नीचे आई और शकुन्तला को ले गई। उसने अवश्य ही उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति को सौंप दिया होगा। महर्षि यह नहीं बता सके कि शकुन्तला को किसे सौंपा होगा।

लेकिन उन्होंने वायदा किया कि वह इस बारे में पूछताछ करेंगे। यदि उन्हें शकुन्तला का कुछ पता चला तो वह सूचना भेज देंगे। राजा दुष्यन्त को इससे सान्त्वना नहीं मिली। शकुन्तला के न होने से वे दुख में डूब गये। कभी-कभी उन्हें ऐसा लगता मानो शकुन्तला ही है।

राजा उसके चित्र बनाते और इससे उन्हें कुछ शान्ति मिलती। 

उनके पास राजा दुष्यन्त अपने राज्य कार्य तो छोड़ नहीं सकते थे। साथ ही साथ उनको किसी काम में दिलचस्पी भी नहीं रह गई थी। विशेषतया उनके सारथि को अपने स्वामी की यह दशा देखकर बहुत दुःख होता । वह अक्सर महाराज से विनती करता कि बाहर घूमने चलें जिससे उनके मन को कुछ शान्ति मिले । लेकिन बहुत समय तक राजा ने उसकी एक न सुनी।

आखिर एक दिन राजा ने बाहर जाने का निश्चय किया । सारथि बहुत प्रसन्न हुआ। उसने रथ में सबसे बढ़िया घोड़े जोते और वे बहुत दूर घूमते हुए चले गये। उन्होंने अनेक शहर और गांव पीछे छोड़ दिये लेकिन उन्हें कोई आश्रम नहीं मिला।

राजा बहुत उदास थे।

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