मौलवी साहब मुझे पढ़ाने आने लगे। उन्होंने कैसे-कैसे पढ़ाया, मैं आगे लिखूँगा। आज जो विशेष बात हुई उसके सम्बन्ध में लिख देना आवश्यक समझता हूँ। सवेरे परेड के पश्चात् मैंने कर्नल साहब से कहा कि मैं नगर देखना चाहता हूँ। उन्होंने कहा कि सेना के लोगों को यों नगर में जाने की आज्ञा नहीं है। मैंने पूछा - 'इसका कोई कारण है?' कर्नल साहब ने कहा - 'यहाँ नगरों में देखने योग्य कुछ होता नहीं। यहाँ के नगर तो निर्धन हैं ही, बहुत खराब भी हैं।

'यहाँ के नगरों के नाम से ही पता चलता है कि उनमें कितनी निर्धनता है। देखा - कान-पुअर, मिर्जा-पुअर, गाजी-पुअर, लायल-पुअर, फतेह-पुअर, हमीर-पुअर, फीरोज-पुअर। यह सब नगर बहुत गरीब हैं और कुछ नगर इतने हीन हैं कि उनके नाम भी वैसे ही रख दिये गये हैं, जिनसे लोग जान लें कि यह खराब हैं। जैसे अलाहा-बैड, जलाला-बैड, सिकन्दरा-बैड, हैदरा-बैड इत्यादि। इसलिये इन नगरों में देखने योग्य है ही क्या? कानपुर में एक ही वस्तु देखने योग्य है। वह है 'मेमोरियल वेल।' मैंने पूछा - 'यह क्या है? किसकी स्मृति में है?' कर्नल साहब ने कहा - 'वह हमारे त्याग, बलिदान, महत्ता, वीरता और विशालता का प्रतीक है। उससे मालूम होता है कि हम लोग संसार पर शासन करने योग्य हैं।'

मैंने कहा - 'क्या वहाँ कोई युद्ध हुआ था?' कर्नल साहब ने कहा - 'नहीं, उसमें बहुत-से अंग्रेज काटकर फेंक दिये गये थे।' मैंने पूछा - 'क्यों?'

कर्नल ने कहा - 'बहुत-से हिन्दोस्तानी अंग्रेजी राज्य के विरोध में लड़ने को तैयार हो गये थे। उन्हीं का यह काम था।'

मैंने कहा - 'लड़ाई में तो यह होता ही है कि फिर उसे एक मेमोरियल का स्वरूप देने की क्या आवश्यकता थी?' कर्नल ने कुछ अप्रसन्नता से कहा - 'ऐसे विचारों को प्रकट करने से तुम निकाल दिये जाओगे। हम लोग भारत में शासन करने आये हैं। किसी प्रकार का उदार विचार प्रकट करने से भारतवासी उद्दंड हो जायेंगे। फिर हम यहाँ शासन नहीं कर पायेंगे और भारत में हमारा शासन नहीं होगा तो यह सेना नहीं रहेगी। फिर हम-तुम कहाँ रहेंगे? इसलिये इतनी बातें याद रखना, भारतवासियों से कभी मिलना-जुलना मत। किसी प्रकार का उदार-विचार प्रकट मत करना।'

मुझे यह बातें अच्छी नहीं लगीं; परन्तु मैं अपने अफसर के विरुद्ध कुछ कहना नहीं चाहता था। मैंने तो भारत के बारे में सभी कुछ जानने का निश्चय किया था। फिर भी मैंने इस पर विवाद उठाना ठीक नहीं समझा। अच्छा मेमोरियल देख आऊँ, फिर उधर से सिनेमा देखता आऊँगा।

आज पहले-पहल नगर देखने का अवसर मिला। पहले सीधे मेमोरियल कुएँ की ओर गया। कुआँ तो दिखायी नहीं दिया। एक वस्तु घिरी हुई और बन्द दिखायी दी और उस पर सारी घटना लिखी हुई थी। मेरी समझ में नहीं आया कि इसकी क्या आवश्यकता थी। समुद्र में इतने जहाज डूब गये, वहाँ कोई मेमोरियल क्यों नहीं बना?

मैं इतिहास के बारे में कुछ नहीं जानता। इसलिये इस कुएँवाली घटना पर कुछ नहीं लिख सकता। पर कोई विशेष मनोरंजन यहाँ नहीं हुआ। ताँगेवाले से मैंने शहर में चलने के लिये कहा। कानपुर निर्धन नगर नहीं है। मुझे गलत बताया गया कि यहाँ धन नहीं है। एक बात अवश्य यहाँ देखने में आयी, एक सड़क पर मैंने देखा कि यहाँ मोची बहुत हैं और चमड़े की दुकानें चारों ओर हैं। मुझे यदि नामकरण करना होता तो इस नगर का नाम कानपुर न रखकर मोचीनगर रखता। पता नहीं यहाँ के सभी नगरों में इतने मोची हैं या नहीं? कम-से-कम बम्बई में मुझे इतने मोची नहीं मिले। मौलवी साहब से पूछूँगा कि इतने मोची कानपुर में ही क्यों एकत्र कर दिये गये हैं?

यों ही कौतूहलवश एक दुकान के भीतर मैं चला गया कि देखूँ किस प्रकार का सामान यह लोग बनाते हैं। वहाँ कुछ तो सूटकेस इत्यादि थे; इनमें कोई विचित्रता नहीं थी। कुछ जूते बिल्कुल विलायती जूतों की भाँति थे। बड़ी अच्छी नकल इन लोगों ने कर रखी थी। कुछ रोमन और पुरानी चप्पलें भी थीं। इनके अतिरिक्त कुछ और जूते थे जो ठीक भारतीय जूते कहे जा सकते हैं। इनमें कुछ ऐसे थे जो ऊपर बढ़िया मखमल के बने थे जिन पर बड़ी सुन्दरता से रेशम अथवा सोने का काम किया हुआ था।

इन जूतों में फीते न थे, न बाँधने का तस्मा था। जान पड़ता है पम्प जूतों को देखकर उनका भारतीयकरण किया गया है। सबसे अच्छी बात इनमें यह है कि यदि झगड़ा हो तो आसानी से यह उतारे जा सकते हैं। फीता खोलने की देर नहीं लग सकती। हल्के भी होते हैं जिससे स्त्रियाँ और बालिकायें भी इसे सुगमता से चला सकती हैं। एक बात और। इतने भारी भी यह नहीं होते कि चोट अधिक लग सके। इसलिये यदि आवश्यकता पड़े तो यह काम भी इससे लिया जा सकता है और विशेष कष्ट भी इससे नहीं होगा। विलायत में ऐसे जूतों की बहुत आवश्यकता है। पार्लियामेंट में विवाद के अवसर पर जब कभी मार-पीट हो जाती है तब पहले तो जल्दी जूते खुलते नहीं और यदि खुलकर कहीं बैठ जाते हैं तो मरहम-पट्टी की आवश्यकता पड़ती है।

घरेलू झगड़ों में कभी-कभी चोट-चपेट के कारण अदालत तक जाना पड़ता है। ऐसे ही जूते वहाँ रहें तो कितनी ही समस्यायें सुगमता से सुलझ जायें। मैंने अपने नाप का एक जोड़ा तो खरीद लिया और एक जोड़ा और सुन्दर देखकर विलायत भेजने के लिये ले लिया। वहाँ मेरी मित्र मिस बुलेट को बहुत पसन्द आयेगा।

सन्ध्या हो चली थी, इसलिये मैंने ताँगेवाले से एक अच्छे सिनेमाघर में ले जाने के लिये कहा। उसने मुझे एक विशाल भवन के सामने लाकर ताँगा खड़ा कर दिया। ताँगेवाले ने कहा - 'फाइव रुपीज।' मुझसे लोगों ने यहाँ बताया था कि हिन्दुस्तानी लोग प्रत्येक चीज का दाम दूना माँगते हैं। इसलिये मैंने ढाई रुपये उसके हवाले किये और ढाई रुपये का एक टिकट खरीदा और सिनेमा हाल के भीतर प्रवेश किया।

Please join our telegram group for more such stories and updates.telegram channel

Books related to लफ़्टंट पिगसन की डायरी


चिमणरावांचे चर्हाट
नलदमयंती
सुधा मुर्ती यांची पुस्तके
झोंबडी पूल
सापळा
श्यामची आई
अश्वमेध- एक काल्पनिक रम्यकथा
गांवाकडच्या गोष्टी
खुनाची वेळ
लोकभ्रमाच्या दंतकथा
मराठेशाही का बुडाली ?
कथा: निर्णय
पैलतीराच्या गोष्टी
मृत्यूच्या घट्ट मिठीत
शिवाजी सावंत