राह में राजा साहब से मेरी घनिष्ठता हो गयी और यह निश्चय हो गया कि हम लोग एक साथ ही ठहरेंगे। जिस समय नौ बजे के लगभग हम लोग पहुँचे तो हमारी कार को कुलियों ने घेर लिया। मैंने समझा कि डाकुओं के समूह ने लूटने के लिये हमारे ऊपर छापा मारा है। किन्तु देखा कि सभी कारों और लारियों के साथ ऐसा ही हुआ है। यहाँ ऐसी ही प्रथा जान पड़ती है। राजा साहब के नौकर और उनके मैनेजर ने हमारे असबाब की देख-रेख की।

होटल वालों ने हाथ में एक-एक कार्ड लेकर हमारी अगवानी की। मैंने तो पहले से ही निश्चय कर रखा था कि सेवाय अथवा शारलिविले होटल में ठहरूँगा और लोगों को असबाब के साथ छोड़कर राजा साहब और मैं रिक्शा पर चल पड़े।

राजा साहब से मैंने पूछा कि सेवाय में चला जाये कि शारलिविले में ठहरें? राजा साहब ने कहा कि 'मैनेजर साहब आ जायें तब निश्चय हो। मैंने कहा कि आप ठीक बताइये। हम लोगों को तो रहना है। राजा साहब ने कहा कि रहने, खाने, पीने, कपड़ों का प्रबन्ध हमारे परिवार में कई पुश्तों से मैनेजर लोग ही करते आये हैं। अब इस प्रथा को तोड़ना कुछ उचित न होगा।' मैंने कहा - 'इसमें प्रथा की तो कोई बात नहीं है। सुविधा की बात है' राजा साहब बोले - 'हमें यही नहीं पता है कि किस स्थान में सुविधा होगी। एक विचित्र बात है कि हमारे मन्त्री और मैनेजर कैसे जान लेते हैं कि हमें किस स्थान में सुविधा होगी और किस स्थान में असुविधा। मैं तो निश्चय ही नहीं कर सकता; वह लोग निश्चय कर लेते हैं।'

मैंने कहा कि अच्छा, थोड़ी देर के लिये मुझे ही अपना मन्त्री मान लीजिये और जहाँ मैं कहूँ वहीं ठहरिये। उन्होंने कहा - 'मुझे तो कोई आपत्ति नहीं है, परन्तु अच्छा होता यदि उनके आने तक दस-पाँच मिनट हम लोग ठहर जाते।'

किन्तु राजा साहब को मैंने बहुत समझाया। तब राजा साहब बोले - 'मैं उन्हें वेतन देता हूँ; यही सब काम करने के लिये; अब मैं कहाँ तक इन बातों में दिमाग खपाऊँ। कोई सिद्धांत की बात हो, बहुत बड़ी समस्या हो तो कुछ सोचा भी जाये। साधारण बातें जैसे कहाँ ठहरना, किस समय चलना, कैसे चलना, यह सब नौकर, चाकर, मैनेजर तथा मन्त्री कर लिया करते हैं।'

इतने में मैंनेजर महोदय भी आ गये और यही राय ठहरी कि सेवाय में ठहरेंगे क्योंकि वही उन्होंने पहले से ठीक कर रखा था। वहाँ ऐसा स्थान हम लोगों को मिल गया जिसमें चार कमरे, एक बैठक, और भी सुविधायें थी।

हम लोगों के आने के तीसरे ही दिन राजा साहब ने इसी होटल में एक दावत दी। उसमें मसूरी में उपस्थित अनेक राजा, अनेक अफसर इत्यादि बुलाये गये थे। पहली दावत थी जिसमें मैं गया, जिसमें अंग्रेज तथा हिन्दुस्तानी लोग भी थे। राजा साहब ने मुझसे और लोगों का परिचय कराया। मैंने शरमाते-शरमाते लोगों से परिचय प्राप्त किया। हिन्दुस्तानियों ने मेरा बड़ा सत्कार किया। सेना में लफ्टंट कोई ऊँची जगह नहीं है, फिर भी ऊँचे-ऊँचे पद के भारतीयों ने तथा बड़े-बड़े धनी भारतीय पुरुष-स्त्री जो इस समय मुझसे मिले ऐसे मिले मानो हम भारत के वायसराय हैं। उसी होटल में नृत्य भी हुआ। मैं भी कई स्त्रियों के साथ नाचा। मुझे भी देखकर आश्चर्य हुआ कि भारतीय स्त्रियाँ साड़ी पहनकर उतनी अच्छी तरह नाच सकती हैं जितनी विलायती स्त्रियाँ और उनमें भी उतने ही संकोच और झिझक की कमी होती है जितनी विलायती स्त्रियों में। कम से कम मसूरी में जो स्त्रियाँ उस दिन नाच में सम्मिलित हुई थीं उनका यही हाल था। दूसरे दिन पता चला कि केवल शराब में लगभग तेरह सौ रुपये लगे थे। इसीसे मैंने समझ लिया कि राजा साहब कोई साधारण राजा नहीं हैं।

दूसरे दिन राजा साहब के मैनेजर से बात होने लगी। तब मैंने पूछा कि राजा साहब तो बहुत ही बड़े दिल के व्यक्ति जान पड़ते हैं। इनके राज्य का विस्तार बहुत बड़ा होगा। मैनेजर साहब ने कहा कि यह सचमुच बहुत बड़े राजा हैं। ग्यारह लाख का इनका राज्य है परन्तु सत्रह लाख इनकी स्टेट पर कर्ज है। मैंने कहा कि तब क्यों इतना खर्च करते हैं? मैनेजर बोले - 'हमारे देश के राजा और धनी लोग पैसे का कुछ भी मूल्य नहीं समझते। आपने सुना ही होगा कि हर्षवर्धन महाप्रतापी राजा था जो प्रत्येक दस वर्ष पर प्रयाग में जाकर अपना सारा धन निर्धनों को बाँट देता था। उसी की परम्परा आज तक भारतीय राजा-महाराजा ढोते चले जा रहे हैं, मगर आजकल के राजाओं ने इस धन-वितरण करने को कला का स्वरूप दे दिया है।

पहले तो केवल यों ही बँटवा देते थे। बँटता तो अब भी है किन्तु नृत्य में, होटलों में, खाने में, पीने में। इसके द्वारा अनेक उद्योग-धन्धों में प्रगति होती है, कल-कारखानों को उत्तेजना मिलती है और आनन्द का आनन्द मिलता है।

राजा साहब के साथ मसूरी में बड़े सुख से था। मैंने जब से सुना कि राजा साहब के ऊपर कर्ज का बोझ है कुछ चिंतित था, किन्तु राजा साहब को तनिक भी चिन्ता न थी। यह चिन्ता का काम भी उनके कर्मचारियों को ही करना पड़ता था। राजा साहब को इससे मुक्ति हो गयी है। मैं एक दिन मसूरी के सम्बन्ध में बैठा-बैठा सोच रहा था - अंग्रेजी राज्य के विस्तार में यह लोग बड़े सहायक हैं। अंग्रेजी राज्य का रंग लाल माना गया है। भारत का नक्शा तो इसीलिये लाल है ही, लाल लिपस्टिक भी यहाँ की स्त्रियों ने अपना लिया है। मसूरी में लिपस्टिक की बड़ी खपत है। देशी-विदेशी सभी महिलायें इसका प्रयोग करती हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि यहाँ की स्त्रियों में भी सभ्यता का प्रसार हो रहा है। ऐसी अवस्था में इंग्लैंड में भी यह जो कभी-कभी शंका हो जाती है कि ब्रिटिश शासन की नींव कुछ हिल रही है, निर्मूल है।

इसी प्रकार से यदि हमारी सभ्यता की और भी बातें धीरे-धीरे यहाँ फैलने लगें तो हमारे शासन की नींव और भी दृढ़ होती चले।

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