पंडितजी मुझे हिन्दी पढ़ाने आने लगे और मैंने हिन्दी पढ़नी आरम्भ कर दी। दो सप्ताह में मैं हिन्दी पढ़ने लगा। पंडितजी मुझसे थोड़ी दूर एक कुर्सी पर बैठते थे। पंडितजी में एक बात विचित्र थी, परन्तु बड़ी अच्छी थी। अपने मन की बात साफ कह देते थे।

उन्होंने कहा कि यहाँ से पढ़ाने के बाद मैं घर जाकर नहाता हूँ। मैंने जब पूछा कि ऐसा क्यों करते हैं? तब उन्होंने कहा कि आप लोग मांस-मछली-मदिरा का सेवन करते हैं और बहुत-सी ऐसी वस्तुयें खाते हैं जो नहीं खानी चाहिये। मैंने उनसे पूछा - 'यदि उन्हें छोड़ दूँ तब आप मुझे छू सकेंगे कि नहीं?' इसका उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया।

छः महीने में अच्छी हिन्दी आ गयी। मैंने 'चन्द्रकान्ता', 'दानलीला', 'एक रात में बीस खून', 'सावन का खिलौना' आदि क्लासिकल पुस्तकें पढ़ डालीं। तब मैंने पंडितजी से पूछा कि हिन्दी में सबसे महत्व की पुस्तक जो हो वह बताइये। अब मैं वही पढ़ूँगा। पंडितजी ने कहा कि यों तो बहुत पोथियाँ हैं किन्तु दो ही सुलभ ग्रंथ हिन्दी में हैं - 'रामायण' और 'सूरसागर।'

मैंने पहले सूरसागर पढ़ा। सूरसागर के दो अर्थ होते हैं या तो बहादुर समुद्र या बहादुरों का समुद्र। जान पड़ता है यह किसी अंग्रेज की लिखी पुस्तक है क्योंकि अंग्रेज जाति से अधिक सागरों की प्रेमी कोई और जाति नहीं हुई है। मैंने समझा था कि इसमें हमारे यहाँ के वीरों का वर्णन होगा जो पहले समुद्र के जहाजों पर छापा मारा करते थे। इस पुस्तक में ग्वाल शब्द आया है यह अस्ल में 'गॉल' शब्द है। यह फ्रांस के निवासी थे। भारतवासियों ने इसी शब्द को बिगाड़कर ग्वाल बना दिया है। ग्वाल-बाल तो कई स्थानों पर आया है। स्पष्ट है कि उन दिनों बाल नृत्य की प्रथा बहुत जोरों पर थी।

कृष्ण शब्द तो स्पष्ट ही क्राइस्ट शब्द से बिगड़कर बना है। उस कवि ने क्राइस्ट की कहानी का दूसरा रूप ही दिया है। वइ इधर भारत में आकर और भी बिगड़ गया है। गलिली की झील के स्थान पर यमुना नदी कर दी गयी है और उसके चमत्कारों को भी दूसरे ढंग से वर्णन किया गया है। एक देश की कहानी दूसरे देश में इसी प्रकार बदल जाती है। मैं इस पुस्तक पर एक बड़ा ग्रंथ लिखने का विचार कर रहा हूँ।

राजनीतिक विजय के पहले इंग्लैंड ने भारत को सांस्कृतिक विजय कर लिया था। यह इस पुस्तक से सिद्ध होता है।

दूसरी पुस्तक रामायण तो स्पष्ट ही होमर की पुस्तक का भावानुवाद है। अनुवाद अच्छा नहीं हुआ है। लिसिडास नाम का कोई अनुवादक था। उसी का नाम बिगड़कर तुलसीदास हो गया। हेलेन के स्थान पर सीता नाम रखा गया। ट्राय का युद्ध ही राम-रावण का युद्ध लिखा गया है। दो और बातें हो सकती हैं। रामायण के राम वही रोमन हैं जिसने रोम नगर की नींव डाली हो, या मिस्त्र के राजा रैमेसिस हों। इन विषयों पर अवकाश मिलने पर छान-बीन करूँगा।

हनुमान तो स्पष्ट ही जर्मन नाम है। उन्हीं के वंश में एक और हनुमान हुए हैं जिन्होंने होम्योपैथिक दवा का आविष्कार किया था।

यह लोग यूरोपीय थे, इसका एक और प्रमाण यह है कि अनेक नगर यूरोप में इन्हीं लोगों के नाम पर बसे हैं। राम के नाम पर रोम, रावण के नाम पर फ्रांस में रोआं, लक्ष्मण के नाम पर लक्षमबुर्ग इत्यादि। इस सब बातों से पता चलता है कि सारे संसार में सभ्यता फैलानेवाले यूरोपियन थे। इन्हीं लोगों ने सबको शिक्षा दी है और इन्हीं लोगों के ग्रंथ किसी न किसी रूप में प्रचलित हैं।

मुझे हिन्दी पढ़ने से बड़ा लाभ हुआ। संसार में उसी विचार द्वारा एकता फैलाई जा सकती है, जिसका नेतृत्व यूरोप करेगा। किन्तु जब तक संसार के सारे देशों को यूरोपवासी विजय न कर लें ऐसा करने में कठिनाई होगी।

मुझे पछतावा होने लगा कि मैंने हिन्दी पहले क्यों नहीं पढ़ी। इससे यूरोपियन संस्कृति के विस्तार का मुझे बड़ा ज्ञान हो गया। मैं और भी हिन्दी की पुस्तकें मँगा-मँगाकर पढ़ने लगा।

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