मैं तो सेना विभाग में हूँ ही और जैसे सेना युद्ध करने के लिये चलती है, उसका थोड़ा अनुभव भी है। शिकार को जब चलने के लिये हम लोग तैयार हुए तब ऐसा जान पड़ा कि किसी देश पर हमला करने एक सेना जा रही है। हम लोगों ने कुल तीन दिनों का कार्यक्रम रखा था। एक दिन की राह थी जंगल तक पहुँचने के लिये। एक दिन वहाँ शेर के शिकार लिये निश्चित किया गया। वहीं से सात मील पर नदी पड़ती थी, जहाँ घड़ियाल का शिकार करने की बात थी।

लोमड़ी, खरहे और मृग तो मैंने बहुत मारे थे, किन्तु शेर और घड़ियाल के शिकार का यह पहला अवसर था। अजायबघर के अतिरिक्त मैंने खुला शेर कभी देखा ही न था। हाँ, चित्रों में अवश्य देखा था।

भोजन तथा और सामग्री एक दिन पहले से चली गयी। एक बैलगाड़ी पर चार बोरों में भोजन का सामान, बरतन, खेमा चला; दूसरी बैलगाड़ी पर आठ नौकर और राजा साहब के कपड़ों की तीन पेटियाँ और एक पेटी मेरी चली। हम लोग दो कार पर चले। एक पर राजा साहब तथा मैं, दूसरी पर उनके मन्त्री, बन्दूकें तथा कारतूस और एक डॉक्टर। डॉक्टर साहब राजा साहब के घरेलू डॉक्टर थे। यद्यपि उनके यहाँ नौकर नहीं थे, किन्तु साधारणतः उन्हीं की चिकित्सा होती थी। वह बंगाली थे। हम लोग जब चले तब पंडितजी ने आकर लाल टीका लगाया और कुछ मन्त्र गाये।

चलने के पहले राजा साहब घर के भीतर अपनी पत्नी से मिलने गये और पता नहीं क्या बातें और सलाह करके आये। चलने के समय एक भीड़-सी लग गयी। सम्भवतः जितने नौकर उनके यहाँ उपस्थित थे, जितनी मजदूरिनें, माली या खिदमतगार, फर्राश और दूध दुहनेवाले तथा घास करनेवाले सब एक ओर से एकत्र हो गये और हाथ जोड़कर हम लोगों के सामने खड़े हो गये।

जहाँ हम लोगों का पड़ाव था, वह राजा साहब की कोठी से सत्ताईस मील से कुछ अधिक था। रास्ता अच्छा नहीं था। ठीक एक घण्टे उन्तीस मिनट में हम लोगों की मोटरें वहाँ पहुँची। खेमा लगा था। उसमें तीन भाग बने थे। एक में टेबुल तथा कुर्सियाँ लगी थीं; दूसरे भाग में राजा साहब तथा मेरे लिये चारपाइयाँ लगी थीं और उसी के बगल में डॉक्टर साहब और सेक्रेटरी साहब के खाट थे! पहुँचते ही हम लोगों को चाय व जलपान मिला और एक घण्टे में भोजन मिला।

भोजनोपरान्त राजा साहब ने मन्त्री महोदय को बुलाकर कहा कि शिकार-प्रबन्धकों को बुलाइये। दो-तीन आदमी राजा साहब के सम्मुख आये। उनके शरीर पर सिवाय धोती के और कोई वस्त्र नहीं था। वह हाथ जोड़कर राजा साहब के सामने खड़े हो गये। राजा साहब ने पूछा - 'सब ठीक है?' उनमें से एक ने कहा - 'आपकी आज्ञा की देर थी, आप बड़े भाग्यवान हैं? कल सन्ध्या को निकट ही शेर की गरज सुनायी दी थी।' दूसरे ने कहा - 'सरकार, रात को कोई नौ बजे होंगे कि शेर दिखायी दिया। पहले दूर से गरजने की आवाज हम लोगों ने सुनी। हम लोग घरों में चले गये। फिर जब आवाज बन्द हो गयी तब हम लोग बाहर दालान में निकल आये। दूर पर हम लोगों ने देखा कि शेर और उसकी मादा तथा पीछे-पीछे एक बच्चा चला जा रहा है। इसलिये हम लोगों ने मचान यहीं से एक मील पर बाँधा है। उसी जगह कल रात को शेर टहलता दिखायी दिया था।'

भोजन करके हम लोग शिकार के लिये चले। दिन-भर बन्दूकें साफ हुईं। कारतूस गिने गये। डॉक्टर साहब और मन्त्री महोदय खेमे में ही रहे। डॉक्टर ने कहा कि मेरी वहाँ क्या आवश्यकता है। मैं यहीं रहूँगा। मैं एक मिक्स्चर बनाके तैयार रखूँगा जिसे पीते ही सब थकान दूर हो जायेगी। ब्रांडी से भी अधिक शक्तिदायक होगा। उसका नुस्खा मेडिकल कॉलेज में हमें हमारे प्रिन्सपल कर्नल फ्राग ने बताया था। ब्रांडी के साथ उसमें दो चीजें और मिलायी जाती हैं। हिन्दुस्तानी वैद्य लोग चन्द्रोदय की बहुत प्रशंसा करते हैं। यह मिक्स्चर यदि किसी को मरने के तीन घंटे पीछे भी मिल जाये तो पाँच मिनट के लिये आदमी उठकर बैठ सकता है। हाँ, तीन घण्टे के बाद इसका प्रभाव नहीं पड़ता।

हम लोग मचान पर जाकर बैठ गये। अपनी-अपनी राइफलें हम लोगों ने एक बार हाथ में लेकर देखीं। फिर हाथ में लेकर इधर-उधर निशाना साधा। मैंने कहा कि गोली मैं चलाऊँगा, राजा साहब! इसमें कोई आपत्ति आपको तो नहीं होगी? राजा साहब ने कहा कि नहीं, आप तो हमारे मेहमान हैं। हमने एक बार इसी स्थान के आस-पास शेर मारे हैं। मैंने कहा - 'नहीं, कहने का अभिप्राय यह है कि आप एक बार भी गोली न चलायें। शेर पर जितनी गोलियाँ लगें, वह मेरी ही बन्दूक से।' राजा साहब ने कहा - 'आप जैसे चाहें वैसे एक शेर मार लें। परन्तु यदि दो निकलें तो एक पर मैं गोली चलाऊँगा।' मुझे इसमें कोई आपत्ति नहीं थी।

मैंने कहा - 'मैं तो, देखिये, ऐसे गोली चलाऊँगा कि खाल खराब न होने पाये। मेरा निशाना तो ऐसा सधा है कि यदि सामने शेर आया तो दो गोलियाँ लगाकर उसकी आँखों में मारूँगा और वह वहीं ढेर हो जायेगा। हाँ, उसकी बगल सामने पड़ी तब कुछ कठिनाई होगी। परन्तु मैं दिमाग पर ऐसी तान के गोली लगाऊँगा कि फिर वह उठने का नाम नहीं लेगा।' मैंने यह भी बताया कि यह जो मेरी 19 बोर की रायफल है, वह सेना की नहीं है; यह राइफल उसमें की है जिसका जोड़ा ड्यूक ऑफ वेलिंगटन के पास था।

अँधेरी रात थी। खेमा एक मील पर था। मशाल का प्रबन्ध इसलिये नहीं किया गया था कि शेर भाग जायेंगे। टार्च हमारे पास थी, ग्यारह बजे के लगभग एकाएक जोर से दहाड़ सुनायी दी। मैं उसके लिये तैयार नहीं था। एकाएक बिना सूचना के जो शेर गरजा तो मैं गोली चलाना भूल गया। मैंने सोचा था कि युद्ध की भाँति पहले कुछ सूचना मिलेगी। परन्तु बिना नोटिस के शेर के गरजने से मैं सब भूल गया और मैं राजा साहब से एकदम लिपट गया जैसे केकड़ा पाँव से लिपट जाता है और बोला - 'राजा साहब, गोली आप ही चलाइये। खाल मुझे दे दीजियेगा।' राजा साहब ने कहा - 'छोड़िये भी तो। जल्दी छोड़िये, नहीं तो शिकार गायब हो जायेगा।' दहाड़ एक बार ही के बाद बन्द हो गयी थी। मेरा मन कुछ ठीक हो चला था। मैंने कहा - 'अच्छा, मैं ही चलाऊँगा।' इधर-उधर देखा तो कहीं कुछ दिखायी नहीं दिया।

पीछे फिरकर हम लोगों ने देखा तो क्या देखता हूँ कि शेर कोई दो सौ गज पर चुपचाप खड़ा है। मैंने तुरन्त गोली दागी। वह हिला नहीं। राजा साहब से मैंने कहा कि देखिये एक ही गोली में काम तमाम। राजा साहब ने कहा - 'लेकिन अभी उछलेगा।' मैंने पाँच गोलियाँ दनादन दाग ही तो दीं। फिर कौन उठता है। मैं तो समझ ही चुका था कि पहली ही गोली में यह जंगल का राह छोड़कर चला गया। मगर उसके निमित्त पाँच गोलियाँ और सही। किन्तु रात में साहस नहीं हुआ कि मचान से उतरूँ। कुरसी पर वहीं सोये। बीच-बीच में उठकर देख लेते थे। वह वहीं पड़ा रहा।

तीन बजे रात को एकाएक पानी बरसना आरम्भ हुआ। हम लोगों को विश्वास था कि शेर मर गया है। फिर भी डर था कि कहीं उतरने पर हमला न कर दे, यदि कुछ भी जान बाकी हो। टार्च फेंककर देखा तो अचल लम्बा-सा पड़ा है।

किसी भाँति तड़का हुआ। हम लोग भीगते पड़े रहे। राइफल सम्भाली और डरते-डरते उतरे। इस समय जान पड़ा कि जिस पर छः गोलियाँ मैंने वीरता से खर्च कीं वह जंगली लकड़ी का एक कुन्दा था।

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