मुझे तो भारतीय मिठाइयों के नाम भी नहीं ज्ञात थे, कानपुर में कभी खाने का अवसर नहीं मिला था। मैंने सोचा फिर वहाँ खाने के लिये अवसर मिले या नहीं। गाइड से कहा कि जो दो-तीन सबसे बढ़िया मिठाइयाँ हों, उन्हें ले लीजिये।

उन्होंने एक मिठाई ली जिसका नाम उन्होंने जलेबी बताया। यह कुछ गोल-गोल मकड़ी के जाले के समान होती है और रंग सुनहला होता है। इसमें रस भरा रहता है और खाने में बहुत मीठी होती है। इसे दाँतों से दबाने और तोड़ने में बहुत अच्छा लगता है। मैं इसे इंग्लैंड भेजना चाहता था, किन्तु पता लगा कि यह केवल एक दिन तक रह सकती है, फिर खराब हो जाती है। इसे सवेरे लोग खाते हैं।

दूसरी मिठाई सफेद गेंद के समान गोल थी। कुछ-कुछ अंडे से यह मिलती-जुलती थी। ज्योंही मैंने आधा काटा, इसमें से रस की एक मीठी धारा बह निकली जो मेरी टाई पर से होती हुई कोट पर और कोट से उतरती हुई पतलून पर बह चली। पता चला कि मैंने इसके खाने में भूल की। यह कुल की कुल मुँह में रख ली जाती है और फिर दोनों होठ बन्द करके दाँतों से दबायी जाती है, तब रस कोट और पतलून को तर नहीं करता, रस सीधे गले के भीतर पहुँच जाता है। इसका नाम भी बड़ा उपयुक्त है। इसे रस का गोला कहते हैं। इसे खाने के बाद मैं दूसरी मिठाई नहीं खा सका।

वहाँ सोडा नहीं मिल सका, न लेमनेड। सुना है कि भारतवर्ष में मिठाइयाँ खाकर या भोजन करके लोग सादा पानी पीते हैं। मैंने कहा कि मैं भी यही करूँ। दुकानदार ने एक विचित्र गिलास निकाला। यह मिट्टी का बना था, छोटा, गोल और नाटा। उसमें पानी भरकर मुझे उसने दे दिया। पीने के बाद एक नौकर ने उस गिलास को फेंक दिया।

मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ। मैंने उससे एक मोल लेना चाहा कि इस नये प्रकार के गिलास को अपने पास रखूँ। किन्तु उसने बिना पैसे ही मुझे एक उपहारस्वरूप भेंट कर दिया। उसे मैं अब तक अपनी आलमारी में रखे हुए हूँ। इंग्लैंड ले जाऊँगा।

मिठाइयाँ यहाँ सस्ती होती हैं। दुकानदारों को मैंने कपड़े पहने नहीं देखा। केवल कमर में एक कपड़ा लपेटे रहते हैं जिसे धोती कहते हैं। इससे जान पड़ता है कि यह लोग सभ्यता की सीढ़ी के बहुत नीचे के डंडे पर हैं।

एक मिठाई की दुकान पर मैंने देखा कि एक आदमी बड़े-बड़े घुँघराले बाल रखे हुए बेलन से आटे की गोल-गोल गेंद बनाकर बेल रहा है और फिर एक कड़ाही में उसे डालता है। कड़ाही में घी खौल रहा था। वह झूम-झूमकर बेलना बेल रहा था। उसके श्यामल मुख पर पसीने की बूँदें चमक रही थीं जैसे नीलाम्बर नक्षत्र में कभी-कभी तारे आकाश से टूटकर गिरते हैं वैसे ही पसीने की बूँदें नीचे गिरती थीं जो उसी आटे की गेंद में विलीन हो जाती थीं। पूछने पर पता चला कि यह दो प्रकार की होती हैं। एक का नाम पूरी है जिसका अर्थ है कि इसमें किसी प्रकार की कमी नहीं है। इसे खा लेने से फिर भूख में किसी प्रकार की कमी नहीं रह जाती। दूसरी को कचौरी कहते हैं। इसके भीतर एक तह आटे के अतिरिक्त पिसी हुई दाल की रहती है। पहले इसका नाम चकोरी था। शब्दशास्त्र के नियम के अनुसार वर्ण इधर से उधर हो जाते हैं। इसीसे चकोरी से कचोरी हो गया। चकोरी भारत में एक चिड़िया होती है जो अंगारों का भक्षण करती है। कचौरी खानेवाले भी अग्नि के समान गर्म रहते हैं, कभी ठण्डे नहीं होते। गर्मागर्म कचौरी खाने का भारत में वही आनन्द है जो यूरोप में नया उपनिवेश बनाने का।

वहाँ से मैं चला। गाइड मुझे एक ऐसी गली में ले गया जहाँ बरतन बिकते हैं। वहाँ सब दुकानदार मुझे बुलाने लगे, किन्तु मुझे कुछ मोल नहीं लेना था, केवल देखना था। इसलिये शीघ्रता से इसे समाप्त कर दिया। यह गली बहुत पतली है और इसके भीतर कोई सवारी नहीं जाती। पैदल ही चलना पड़ता है। इसमें सड़क भी नहीं है। केवल पत्थर बिछे हैं। ईसा के दो-तीन हजार वर्ष पहले की यह जान पड़ती है।

यहाँ से हमारी कार सारनाथ को चली। मैंने राह में सारनाथ का इतिहास जान लेना उचित समझा। इसलिये गाइड से पूछा कि यह सारनाथ क्या है और इसे क्यों लोग देखने जाते हैं। उसने बताया कि किसी काल में वहाँ एक नगर था। काशी के शासक बाबा विश्वनाथ के साले यहीं रहते हैं, इसलिये इसका नाम सारनाथ है। कुछ लोगों के अनुसार वहाँ महात्मा बुद्ध, एक बड़े महान व्यक्ति, आये थे, इसलिये यह विख्यात है।

मैंने पूछा - 'यह नगर कब था और क्यों खंडहर हो गया और यह बुद्ध महात्मा कौन सज्जन थे?' वह बोला - 'यह नगर कब था, इसका पता तो मुझे नहीं है क्योंकि यह बहुत पुराना है। मेरे दादा ने भी ऐसा ही इसे देखा था और वह कहते थे कि मैंने भी अपने दादा से इसके सम्बन्ध में ऐसा ही सुना है। चार-पाँच सौ साल पुराना तो यह अवश्य ही होगा। नगर खंडहर क्यों हो गया, इसका कारण इसके सिवाय और क्या हो सकता है कि घोर बरसात हुई हो किसी समय। बुद्ध महात्मा एक राजा थे। यह बुध के दिन पैदा हुए थे, इसलिये इनका नाम बुद्ध पड़ गया। इनके भाई ने इनका राज छीनकर इन्हें घर से निकाल दिया। यह जंगल में बेहोश पड़े थे। इन्हें एक स्त्री ने हलवा खिला दिया और यह जी गये। तब इन्हें बड़ा दुःख हुआ और यह सारनाथ आये। वहाँ उन्होंने उचित समझा कि कोई धर्म चलाया जाये क्योंकि धर्म चलाने में बड़ा सुख और आदर है। बहुत-से चेले मिल जाते हैं और राजा लोग भी आदर करते हैं।'

इनके धर्म में विशेषता है। वह यह है कि कितनी ही लात आप खाते चलिये, कुछ किसी से कहिये मत। कोई आपको गाली दे दे तो कहिये - ठीक किया। कोई आपकी स्त्री को उठा ले जाये तो कहिये - बड़ा अच्छा किया। कोई आपको पीट दे तो कहिये - आप बड़े योग्य हैं। अब मेरी समझ में आया कि मुसलमानों ने कैसे यहाँ शासन किया होगा और किस प्रकार अंग्रेज लोग शासन कर रहे हैं। एक बात और उसने बतायी कि यह लोग मनुष्य क्या किसी जीव को नहीं मारते। मान लीजिये, यह लोग खाते रहें और थाली में कुत्ता आकर खाने लगे तो उसे हटायेंगे नहीं। सब जीवों पर दया करते हैं। यह सोये रहें और चील इनकी नाक नोच ले जाये, यह बोल नहीं सकते।

इतनी देर में हम लोग सारनाथ पहुँच गये। एक ऊँचा-सा ढूहा दिखायी पड़ा जिस पर एक टूटी-सी अठकोनी मीनार थी। उसने बताया कि हिन्दुओं के सबसे बड़े देवता रामचन्द्र थे। उनकी स्त्री सीता थीं। राम ने सीता को निकाल दिया। तब वह यहीं आकर रहती थीं और उसी में भोजन पकाया करती थीं। चावल जो वह धोकर फेंक देती थीं वह अब भी कहीं मिट्टी में दिखायी देता है। एक-एक चावल हजारों रुपयों का होता है। अमरीका के लोग यहाँ से मोल ले जाते हैं और वह जो ईंटों का बड़ा-सा स्तूप दिखायी देता है, वह भी विचित्र है। एक अहीर उसी पर गाय लेकर चढ़ जाता था और एक बरतन में दूध दुहकर ऊपर-ऊपर कूदकर दूध लिये सीता की रसोई में जाता था। वह इसलिये कि सीताजी के लिये दूध धरती से छू न जाये और प्रशंसा की बात तो यह है कि न यह दूध छलकता था, न पृथ्वी पर गिरता था।

और खंडहर देखे। उसने बताया कि यह जो खंडहर है, वहाँ जब घर थे तब उन्हें विहार कहते थे। उनमें रहनेवाले यहाँ से पूरब चले गये। उन्होंने एक प्रान्त बसा लिया जिसे 'बिहार' कहते हैं। यहाँ लोगों के न रहने के कारण यह अब खंडहर हो गये।

यहाँ कुछ साधु भी दिखायी दिये। वह पीले रंग के थे और विचित्र प्रकार का कपड़ा पहने हुए थे। चेहरे से जान पड़ता था कि इन्हें कंबल या पांडु रोग हो गया है। मैंने गाइड से पूछा कि यह सब के सब इतने अस्वस्थ क्यों हैं। उसने कहा कि यह लोग अस्वस्थ नहीं हैं। इनका रंग ही ऐसा है। यह कम खाते हैं और ऐसी वस्तुएँ खाते हैं कि रक्त की कमी रहे। यह लोग मांस कोई दे दे, तब खा लेते हैं मगर अपने हाथों नहीं मारते क्योंकि इनके धर्मप्रवर्तक की यही शिक्षा है।

वहीं एक अजायबघर था। जहाँ बहुत-सी मूर्तियाँ रखी थीं। गाइड ने बताया कि सब मूर्तियाँ यहीं से खोदकर निकाली गयी हैं। जान पड़ता है कि पुराने समय में भारतवसियों को कोई काम नहीं था, इसीलिये बैठे-बैठे दिन-भर इतनी बड़ी-बड़ी मूर्तियाँ गढ़ा करते थे। मेरे विचार से जब यूनानी लोगों की सभ्यता नष्ट होने लगी तब वहाँ के मूर्तिकार भाग कर यहाँ चले आये। वहाँ भी मूर्तियाँ बहुत बनती थीं और वह लोग यहाँ आकर मूर्तियाँ गढ़ने लगे, क्योंकि अब भी मूर्तियाँ बनाना सीखने के लिये यहाँ से लोग इटली, इंग्लैंड आदि देशों में जाते हैं। तब उस काल में कैसे बना सके होंगे? मैंने पूछा - 'सीताजी यहाँ भोजन बनाती थीं, उनकी कोई मूर्ति यहाँ नहीं दिखायी देती।' गाइड ने कहा कि वह पर्दे में रहती थीं। इसलिये उनका कोई चित्र अथवा उनकी मूर्ति नहीं बन सकी और पीछे बहुत दुःख के मारे वह पृथ्वी के भीतर चली गयी। उनकी कोई मूर्ति इस देश में नहीं है।

दो बज गये। मुझे अब भूख और प्यास दोनों लग रही थीं। वहाँ न कुछ खाने का सामान था न पीने का। इसलिये मैं और कहीं आज देखने न जा सका। कार पर तुरन्त अपनी बैरक में लौट आया।

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