पन्द्रह दिन अभी छुट्टी को बाकी थे कि राजा साहब घर लौटने के लिये तैयार हो गये। मुझसे कहा कि आप भी चलिये। मेरे घर के पास एक नदी है। वहाँ बहुत बड़े-बड़े घड़ियाल हैं और उसी के पास एक जंगल है जहाँ मृग बहुत-से पाये जाते हैं। शिकार का सुन्दर प्रबन्ध होगा। आपको कोई कष्ट नहीं होगा। पहले तो मेरा विचार नहीं था, किन्तु उनके बहुत कहने पर मैंने साथ जाना निश्चय किया।

बिहार में गया से सात मील पर एक स्थान पर राजा साहब रहते थे। बड़ा विशाल भवन था। सुन्दर सजा हुआ। उनके घर का थोड़ा-सा विवरण देना अनुचित न होगा। मैं जिस भाग में ठहराया गया हूँ उसी का ठीक विवरण दे सकता हूँ क्योंकि मैंने देखा और राजा साहब से ही सुना कि जैसे सृष्टि के प्राणियों में दो विभाग होते हैं पुरुष तथा स्त्री, उसी प्रकार भारत में प्रत्येक घर भी दो भागों में विभाजित रहता है। पुरुष-भाग और स्त्री-भाग। स्त्री-भाग में पुरुष नहीं रह सकते और पुरुष-भाग में स्त्री नहीं। स्त्री-घर में क्या विशेषताएँ होती हैं, मैं कह नहीं सकता क्योंकि उसे देख नहीं सका - न इस जीवन में देखने का अवसर ही मिल सकता है। राजा साहब ने बहुत पूछने पर केवल यही कहा कि वहाँ स्वराज्य रहता है। जो चीज चाहे जहाँ रख दी जाये। जैसे वहाँ जाकर यदि आप बैठना चाहें, तो पहले कुरसी या खाट अच्छी तरह देख लेनी होगी क्योंकि दो-एक सूई कहीं पड़ी रह सकती हैं। बिछौने के नीचे पान का डब्बा पड़ा रह सकता है। मेज पर कलम-दवात के स्थान पर चूड़ियाँ रखी मिल सकती हैं। एक दिन पहले जो नया उपन्यास आया होगा जिसे आप खोजते-खोजते तंग आ गये होंगे, उसे आप वहीं पायेंगे, जिस पर बच्चे के दूध वाला कटोरा रखा होगा। घर के पुरुष-भाग की कोई वस्तु यदि न दिखायी दे तो पहले वहीं खोजनी चाहिये। राजा साहब कहने लगे कि एक बार माउजर की नई पिस्तौल मैंने मँगवायी थी। तीन दिनों के पश्चात् वह घर में अँगीठी के पास पायी गयी। उससे आग हटाने का काम लिया जा रहा था। मैंने सोने-चाँदी की सुरती की डिबिया एक बार पेरिस की एक कम्पनी से मँगवायी। उसमें बच्चे की आँख का काजल रखा जाने लगा।

बाहर की रहने की जगह बड़ी भव्य तथा सुन्दर थी। इसके कहने की आवश्यकता ही क्या। जिस देश के पीछे ताजमहल की परम्परा हो वहाँ घर बनाने में सुन्दरता पर विशेष ध्यान दिया जाता होगा। किन्तु मुझे जो आश्चर्य हुआ वह घर के भीतर के भाग को देखकर, घर के बाहर के भाग को देखकर नहीं।

पहले मैं जिस कमरे में ठहराया गया उसका कुछ वर्णन कर दूँ। धरती से लेकर भीत पर आधी दूर तक इटली की बहुत सुन्दर टाइल लगी थी जिस पर बढ़िया फ्रांसीसी फूल और लताएँ रंगों में बनी थीं। उसके ऊपर दीवार पर बेल्जियम के बने बड़े-बड़े दर्पण लगे हुए थे और छत पर जर्मनी के झाड़ लटक रहे थे। अफ्रीकी महोगनी की मसहरी, मेज और बर्मा की टीक के दरवाजे थे। कमरे में एक बड़ा सुन्दर पियानो भी रखा था। मैंने राजा साहब से पूछा कि आप इसे बजाते हैं? उन्होंने कहा कि मैंने सीखने के लिये मँगवाया था, किन्तु नौ साल से यह खोला नहीं गया। मैं सीख भी नहीं सका। मेज पर सुन्दर-सुन्दर लिखने-पढ़ने की सामग्री रखी थी, जो यूरोप के किसी देश का प्रतिनिधित्व करती थी। दरवाजों पर विलायती जालीदार तथा भीतर की ओर फ्रांस के मखमली परदे टँगे थे। जमीन पर ईरान का सुन्दर कालीन बिछा था और उसके चारों ओर कश्मीर के सुन्दर रग बिछे हुए थे। इधर तो सब विदेशी ढंग का सामान था। उसी के पास देशी लोगों के बैठने का प्रबन्ध था। कमरा बहुत सुन्दर था। दीवारों पर तथा छत पर चित्रकारी थी। बैठने के लिये गद्दे बिछे थे और किनारे-किनारे मोटे-मोटे तकिये रखे थे। बाहर गमलों में अनेक देशी-विदेशी फूल लगे थे। छत पर कनेरी, बुलबुल और लाल पक्षी के पिंजड़े टँगे थे। सारा घर देखने से मुझे तो यह जान पड़ा कि एक स्थान पर सारे संसार का प्रतिनिधित्व यदि कोई स्थान पा सकता था तो राजा साहब का घर! लीग ऑफ नेशन्स के दफ्तर के लिये सबसे उपयुक्त स्थान राजा साहब का घर मुझे जान पड़ता था।

एक और नई और विचित्र बात मैंने राजा साहब के यहाँ देखी। पाँच या छः बज रहे होंगे। एकाएक मेरी नींद खुल गयी। मेरे कानों में टनाटन घंटे के शब्द आने लगे। पहले मैंने समझा कोई विचित्र घड़ी है जिसमें घंटे या मिनट नहीं सेकेण्ड टन्टन् बज रहे हैं। फिर एकाएक बड़े जोरों से ऐसा शब्द हुआ मानो किसी शिकारी ने तुरही बजायी हो। मैंने समझा, कहीं आग लगी है। मैंने झटके से कपड़े पहने और बाहर निकल आया। वहाँ कुछ नहीं। यह देखकर कुछ शान्ति हुई। परन्तु शब्द बराबर आ रहे थे। मैं उधर ही चला तो देखा कि उसी घर के पास, किन्तु अलग, एक घर बना है। उसमें एक मन्दिर है। मन्दिर का द्वार खुला है और भीतर एक व्यक्ति घंटा ठोंक रहा है और एक व्यक्ति शंख फूँक रहा है और एक आदमी हाथ में पीतल की एक वस्तु लिये है जिसमें पचीसों बत्तियाँ जल रही हैं। उसको वह एक मूर्ति के चारों ओर घुमा रहा है।

मैं भीतर जाकर देखना चाहता था कि क्या है, किन्तु मैं रोक दिया गया। उसी क्षण वह दीपों की माला लिये बाहर निकला। मेरी ओर उसने ऐसे देखा जैसे मैं किसी दूसरे लोक का प्राणी हूँ। उसके माथे पर एक निशान बना था जैसे कोबरा के मस्तक पर होता है। उसके सिरे के पीछे एक जूड़ा बँधा था जैसे कुमारी रानी एलिजा के युग में इंग्लैंड में महिलायें बाँधा करती थीं। कमर में धोती के अतिरिक्त उसका सारा शरीर नंगा था। धोती भी रेशमी थी। वह दीप का समूह हाथ में लिये घर के जनाने भाग में चला गया।

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